Saturday, October 24, 2020

Tere Sang......

रोज़ संग तेरे जीने के
इक वजह मिल जाती है
बेवजह जिसतरह 
खुद की धुंध में 
हर शाम ढल जाती है,,,,,,   
मधुर संगीत सुनाती 
जुगनू थकी रात को 
अपने परों से सहलाती है    
खिली सुबह के आने का 
पैगाम उन्हें 
हँसकर दे जाती है,,,,,,,,,
तीखी पहली किरण से  
चाहूँ केशू सवारना 
पानी को दर्पण समझ 
सोई रंगत निखारना 
अपनी थपकियों से आँखों 
को भी जगा जाती है,,,,,,,,
मलहार गाती हवा जब दबे 
पांव छू कर गुज़र जाती है 
कहती है ये नज़रे........  
है कितनी रौनके दफ़न इनमें 
पलकों से पल वो छाँट ले  
नज़रों की जमीं पर देख
कभी अश्कों से भी काम ले
बेवजह की इसकी बारिश 
जाते - जाते होठों को वजह 
चमक के दे जाती है,,,,,,,,,, 
अनचाही लकीरें जब भी  
किस्मत के रूबरू आती है  
लड़ कर अकसर 
हथेली में ही रह जाती है  
ख़ौफ़ नहीं जिनको 
तक़दीर -ए- रुख का वहीं 
लकीरों से उभरकर 
ज़िंदगी पर छा जाते है,,,,,,,,,, 
  
 

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