Sunday, January 10, 2021

Pahli Bhor.....

दिनों बाद.....फिर वही रात आई है 
बीत रही ये पहर आखिरी
तोड़कर अपनी निंद्रा गहरी,
टिक टिक सुन घड़ी धड़कन की  
बिन बात के पलकें भी फरकि,
एक बार फिर अँधियारे 
को सूरज मात देने वाला है, 
वक़्त का पहिया फिर 
नए सिरे से घूमने वाला है..........,
 
लगा रखी है सर माथे 
कुछ कच्ची कुछ पक्की 
यादों की पगड़ी, 
पास ही है बंधी पड़ी 
कुछ कही कुछ अनकही 
बातों की गठरी, 
दिल चाहें.....   
बंधन इनके न खोलूँ कभी 
चुप रहूँ न इस पर बोलूँ कभी, 
कौन जाने इस साल 
क्या पाकर खोने वाला है,
कुछ पल में ही नई सदी 
का आगाज़ होने वाला है.........,
   
ओढ़े बैठा है मन क्यों 
तू वही पुराने मैले कुचैले 
सोच से सिले चादर को 
निकाल इस मंथन से इसको 
कदम बढ़ा नज़रे उठा 
देख पूरब की ओर     
सुनहरे लिबास में लिपटा  
ओस में धुला फिर निकला नए साल की पहली भोर..........,  

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