Saturday, October 24, 2020

Tere Sang......

रोज़ संग तेरे जीने के
इक वजह मिल जाती है
बेवजह जिसतरह 
खुद की धुंध में 
हर शाम ढल जाती है,,,,,,   
मधुर संगीत सुनाती 
जुगनू थकी रात को 
अपने परों से सहलाती है    
खिली सुबह के आने का 
पैगाम उन्हें 
हँसकर दे जाती है,,,,,,,,,
तीखी पहली किरण से  
चाहूँ केशू सवारना 
पानी को दर्पण समझ 
सोई रंगत निखारना 
अपनी थपकियों से आँखों 
को भी जगा जाती है,,,,,,,,
मलहार गाती हवा जब दबे 
पांव छू कर गुज़र जाती है 
कहती है ये नज़रे........  
है कितनी रौनके दफ़न इनमें 
पलकों से पल वो छाँट ले  
नज़रों की जमीं पर देख
कभी अश्कों से भी काम ले
बेवजह की इसकी बारिश 
जाते - जाते होठों को वजह 
चमक के दे जाती है,,,,,,,,,, 
अनचाही लकीरें जब भी  
किस्मत के रूबरू आती है  
लड़ कर अकसर 
हथेली में ही रह जाती है  
ख़ौफ़ नहीं जिनको 
तक़दीर -ए- रुख का वहीं 
लकीरों से उभरकर 
ज़िंदगी पर छा जाते है,,,,,,,,,, 
  
 

Wednesday, September 30, 2020

Dekh Rahi Hoon Mein.....

दिनों बाद लगा एक ख़्वाब देख रही हूँ मैं.......
पल को दिन...... दिन को साल में 
वक़्त की खाल ओढ़े 
सूरज को पल - पल 
बदलते अपनी चाल देख रही हूँ मैं........,
 💫💫
पहाड़ों को करते पहरेदारी 
अंबर को चुराते लाली
तिरछी हरी घास पर लेटे
बेख़ौफ़ इस जहां से होके  
फिर एक बार 
आँखों से वफ़ा खोज रही हूँ मैं...........,
 💫💫  
भोर हुई सूरज निकला 
ओस के पाँव ने जमीं कुरेदा 
सोंधी - सोंधी ख़ुश्बू बिखरी 
हर कली ने अपना पट खोला
बांधा कई बार इन नज़ारों ने 
पर लगता है 
जमीं से नाता आज जोड़ रही हूँ मैं........, 
💫💫 
बंदिशों के घेरों को 
पार कर निकले थे  
मन के परिंदे 
बेपरवाह हो उड़ चले थे
तेज़ हवाओं को कर अनदेखा
ऊपर बादलों के बीच जा बैठे थे 
सुने आसमां के आँगन को 
खाली पड़े मन के गागर को 
फ़िर बूँदों से दामन भरने की सोच रही हूँ मैं.......,
💫💫  
मोल नहीं इस दृश्य का 
यहाँ मन का विकार भी 
बेकार हुआ
भरी दुपहरी में जब 
अँधियारा उजाले से 
पार हुआ
आओं अपने परों को खोलें     
और आसमां के पर् निचोड़े 
पहली दफ़े 
बारिश में आज 
ख़ुदके और जमीं के भरते ज़ख़्म देख रही हूँ मैं.......,   
 

Thursday, September 17, 2020

Mere Hisse Ki Dhoop..

"आईने को इतनी समझ तो आए 

 मेरे साये को ख़ुद पहचान जाए "


सिमटी यादों का एक पुलिंदा है ज़िंदगी,
सिलसिला न छोड़ इसे समेटने का,
इसके लिखें हर हर्फ़ से झलकती है संजीदिगी !!

गुज़रते वक़्त ने नवाज़ा मुझे असीम तज़ुरबों से, 
पर ज़िंदगी से अदायेगी में,
इल्म हुआ ख़ुद से तार्रुफ़ नहीं बरसों से !!

वक़्त के हाथ से छूटी फ़िर इक तस्वीर पुरानी, 
मकां तो साफ दिखा आँखों का, 
मगर चेहरे पर छाई थी पहली सी वीरानी !!

ये बात तब की है जब कुछ न था पनाह में, 
मेरे हिस्से की धूप भी, 
बिछा रखें थे तेरी राह में !!

चिलचिलाती धूप में पलकें जली इंतज़ार में,
दोष रोशनी का नहीं वो आँखें है, 
जो चुपचाप बैठ सारी रात काटी ख़्वाब में !!

ढ़ली शाम सी नरमी आ गई मेरे जज़्बातों में,
रहने दे नम अनसुलझा इन्हें, 
हर लफ्ज़ उलझे है एक दूसरे को सुलझाने में !!
   
इन बूढ़ी साखों ने झेलें ख़ामोशी से कई पतझड़, 
अब मेरे हिस्सें की धूप, 
इनपर भी थोड़ी आने दे..........!!!   
  

Thursday, September 10, 2020

Chal Wahan Jaate Hain....

चल वहाँ जाते है..........,
  
जहाँ खुली बाहें पसारे ये प्रकृति हमें पुकारे, 
आँखों की प्यास बुझाने को ओस नित करे इशारे, 
इनकी पाक पनाह में आओ फ़िर से 
सारे जहां को हम भूल जाते है !!
चल वहाँ जाते है..........,
  
जिन पहाड़ों की ओट से जमीं को झाँकती 
हर रोज सुबह नज़र आती है,
सूरज से मर्म पाते हि जहाँ सूखे पत्ते भी 
हरे फ़र्श पर सोने सा चमक जाते है !!
चल वहाँ जाते है..........,
  
नीले आँचल की छाँव में लेटकर सारी 
क़ायनात एक नज़र आती है,
नभ के तारें जहाँ अकसर जमीं हाथ बढ़ा तोड़ जाती है,
दुनियाँ से कटकर जहाँ खुद से जुड़ हम जाते है !!
चल वहाँ जाते है..........,  

हवाओं की बदली रुख से रुखसत 
होती जहाँ बरसात है, जिसकी हर बूँद में 
अपना अक्स नज़र आता साफ़ है, 
बादलों के बीच जाकर चलो हम नदियों में नहाते है !!
चल वहाँ जाते है..........,

ख़्वाब देखे जहाँ आसमां संग होने की जमीं, 
सतरंगी सपने जहाँ रोज खिलाए हर कली,
सावन की राह में कलियाँ जहाँ गुलमोहर सी हो सजी,
बारिश की सुगबुगाहट जहाँ आहट सावन के दे जाते है !! 
चल वहाँ जाते है..........,

Sunday, September 06, 2020

Kahan Dur Hoon Mein.....

कितने अदब से बैठे है ये ईट की दीवारों में,

देखने चाँद भी निकला है इन्हें दिन के उजाले में !!

मिसाल इश्क़ की कहाँ से दूँ इस ज़माने में,


कि सारे ग़म है खोने के जो पाये इसे भुलाने में !!

मुस्कराहट की सलीबों पर चढ़ा हर आँसू,


ज़िंदगी यूँ गुज़री कि मिलती है अब मिसालों में !!

दिन - रात कब बीते रोते हुए मुखड़ों को हँसाने में,


मोहताज़ हुई ज़िंदगी और कि अधूरी ख़्वाहिशों में !! 

सुकूं के पल बिखरे थे छोटे - छोटे तराशे में, 


वक़्त थमा नही ज़िंदगी निकली ग़ैरों की बादशाही में !!

इबादत की, हर दरगाह, हर शिवालों में, 


इलम हुआ फ़रिश्ते मिलते है आजकल सिर्फ हवालों में !!

बिछड़ के मुझसे साया आज तेरे आस पास फैला है,


अंदर झाँक के देख टूटा हूँ पर कहाँ तुझसे दूर हूँ मैं !!






Monday, August 31, 2020

Suraj Ki Aanch...

आईने में दिखा चाँद फ़िर ओझिल हो गया

 चढ़ा ही था आँखों में वो शख्स बन के नशा, 
बदले रुत में नज़रों से दरिया हो उतर भी गया !!

सूरज की आँच देख चेहरा निखर सा गया

बदगुमां रहा सारी उम्र जिस रोशनी से,
आज ख़ुद के साए की आहट से दिल डर सा गया !!

हज़ारों ख़्वाब का ख़िर्मन बिखर सा गया

तोड़ती रही पल - पल न जाने किसकी अना इनको,
हवा बन मिरे क़रीब से जाने कब वो गुज़र भी गया !!

किसी के गुमां के सहरा में दिल ख़ाक सा उड़ गया

उल्ट गई तदवीरें कहीं न फिर इलाज़ हुआ,
आख़िर में बीमार -ए- दिल को बदनाम कर ही गया !!

यक़ीन होता नहीं पर लब्ज़ अब इश्तिहार हो गया 


जहाँ दिखें धनक के रंग कई वो यहाँ अख़बार हो गया,
सुजूद तलाशती रूहों को सुकूं से कोसों दूर कर गया !! 




  

Sunday, August 23, 2020

Zindgii...mere jaisi haii...

कभी - कभी यूँ लगा, ज़िंदगी थम सी रहीं,

हर कदम पे ये घट सी रही, कोशिश करी बार बार यहीं,

रुकें नहीं कदम, बिना आए मंज़िल कहीं,

हर नाता, हर बाधा, ज़िंदगी की हर गाथा,

पलटते - पलटते ये महसूस हुआ,

जीवन है एक साधना, ये ज्ञान प्राप्त हुआ,

पता है मुझे अब, अपने हर ज़ख्म की गहराई का,

पैर जमीं पर हो तो चलता है पता, आसमां की ऊचाई का, 

तेज़ लहरों में ख़ुदको पहले भी थाम चूँकि, 

कश्ती से किनारें का पता जान चूँकि, उठे तूफां से क्या डरू, 

अब तो समंदर को नापना, सीख चूँकि हूँ मैं,

फिर भी लगती राहें बोझिल है, दूर अब भी इनसे साहिल है,

राह में कुछ कंकड़ भी चुभे, कई ठोकरें भी मिले,

रंग बदलती इस दुनियाँ में, बहार के मौसम कम हि मिले,

मुश्किल हालात में, पहलू में भीगे लम्हात थे,

संग दबे कुछ अल्फ़ाज़ लिए जा पहुँची,

दुनियाँ के बागीचे में, चादर सी बिछी दरीचे में,

देखने में लगी आँखों को भली, थी सात रंगों से सजी,

पूस की रात में जैसे, पशमीना ओढ़े थी खड़ी,

पल - पल में सुकून तलाशते फिरती है, 

जमीं की तरह ये भी कई परतों में खुलती है,

ये ज़िंदगी भी कुछ मेरे जैसी है..............

Tuesday, August 18, 2020

Tu Issh Tarah Se......

तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है.............  
जहाँ तलक जाए ये नज़रे........  
लगे नज़ारों में तेरी कमी सी है,

तेरे बैगैर राहें भटक गई थी कहीं
ढूँढा हर शह, हर गली, हर मीनारों में, 
  
तुझ में खोकर हि हुई पूरी तलाश मेरी 
अब सिर्फ तू ही अपना जो रोशन गैरों की महफ़िल में है,

तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है...........  
ये आसमां ये सितारें कर रहें जहां रौशन 
फ़िर भी बैठा हूँ मैं शाम -ए- ग़म के अँधेरों में,

तलाश में तेरी कई मुद्दत से हूँ मैं 
ख़फ़ा हूँ पर तुझ में हूँ बाकि जगह लापता हूँ मैं, 

मैं हूँ एक जलता दिया तू जिसकी रोशनी है   
क्या कहूँ तुझ बिन ज़िंदगी लगती अधूरी है

पनाह में तेरी हर हसरतें भी मेरी क़ामिल है  
तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है.......... 




Friday, August 07, 2020

Khushboo...

हर तरफ मशहूर हुआ इतना
अब ग़ुमनाम होने की हसरत है
देखूँ जब भी आसमां
होने लगती दूरी से नफ़रत है
जलते दीये की रोशनी भी
तब चाँद सी लगती है
जब अजनबी शहर में 
अँधेरी रात.........  
थोड़ी ठहर कर गुज़रती है
चलो कुछ माहौल  
साझा करते है
खूबसूरत लोग और कुछ
खूबसूरती की बात करते है
करीने से लगा रखें है......  
टेबल पर मौसमी फूलों के 
जैसे बाज़ार सजा रखें है
आस - पास भिनना रहे 
कई चाहने वाले
छिनकर रंगत इसकी 
खुद को कहे इनके रखवाले
हो गया है इश्क़ इन्हें 
फूलों की संगत से
सोचे रंग - संग ख़ुश्बू भी 
कर दे इनके हवाले........ 
बचे कुछ कोरे पन्ने है 
सूखी जिसमें कुछ पंखुरियाँ है 
देख इन्हें लगता है 
हर साथ होता यहाँ अधूरा है.......   
कुछ बीती बातें है इस ज़िंदगी की 
अब भी अनकही.........  
मुड़कर यूँ देखती है मुझको 
जैसे जानती तक नहीं.......   

Monday, July 27, 2020

Ijaazat Toh Do....

कितनी रूमानी रातें यूँ ही छत पर गुज़री
कभी चहल कदमी में....कभी नंगी फ़र्श पर लेटे
आसमां को निहारते कहा कई दफ़ा 
मौसम -ए- हालात कैसा भी हो गुरेज़ नहीं 
कर सकूँ अपनी बेचैनियों की हिफाज़त इतनी मोहलत तो दो !!

सुबह की पहली किरण से पलकें है भाड़ी  
इनपर भी हो कभी ओस की बारिश
सोयी नहीं कब से नगमें हमारी  
छेड़ दे ज़रा वो धुन.....जो लगे तुझे प्यारी
इन गीतों की तरह आधे - अधूरे ख़्वाब है 
इन्हें फिर आँखों में सजोने की इजाज़त तो दो !!

धीमी - धीमी पिछली रात संग मेरे जो नज़म जली 
सुबह से मिलने भोर तक थी मेरे पास रुकी
फर्श पर अभी कतरन सी बिछी और थोड़ी सी राख़ बची
कर दूँ इसे मिट्टी के हवाले पहले जख़्मों पर मलने तो दो !!

आया है सावन..... मौसम लिए बारिश 
जमीं से मिलने की हो रही फिर से साज़िश 
दिल करता है मैं भी कर दूँ लम्हों को 
लफ़्ज़ों में बीत जाने की गुज़ारिश 
गीली पड़ी है दिल की जमीं इनमें ख़्वाब के बीज बोने तो दो !!



Saturday, July 18, 2020

Phir Yeh Raat Akelii...

कैसे कहूँ कैसे कटी रातें 
                       .........दिन निकला सुबह हुई 
    ........फिर हुई यादों की बरसातें 
सूखे से है दिन..... 
                     .......सूखी लगे शामे
सूखी - सूखी सी है..... ख़्वाब में भीगी रातें 
     बेचैन हुई रात फ़िर..... 
          .........सूरज से लगाई गुहार कई   
दूर कैसे रहें अँधेरों से है इसे प्यार भी
दिनों बाद आई......फिर ये रात अकेली.....
    .........छुपकर किरणों से फ़िर बनने मेरी सहेली
💫        💫           💫             💫
कुछ अपनी कहूँ..... 
          .........कुछ इसकी सुनूँ 
इक पल को भी संग इसके......चुप न रहूँ 
जो नीभ न पाई...... 
         ........उन वादों की देने दुहाई
लो इसी बहाने रात...... 
            ........फिर मुझसे मिलने आई  
💕        💕           💕              💕
सोचा कई बार.......छोड़ दूँ इसका भी साथ 
फिर याद आई.......  
          .........बीती रात जो थी वीरानी
गुज़रे पल थे ऐसे...... खड़ी सुनी हवेली जैसे
हर मोड़ मिली...... 
          .......पर जो न सुलझी वो तू पहेली  
बीतें दिनों की ठहरी 
            ........ तू ही मात्र सहेली 
दिनों बाद आई......फिर ये रात अकेली.....
💗          💗           💗            💗
गुज़री हर लम्हें मैं.......... 
          .........पर रहा रुका साया इंतज़ार में
कहने को इक बूँद न गिरी......  
  .........फिर भी भीगी हूँ इश्क़ की बरसात में  
न जाने दिल की कही.......  
                .......सच कब कैसे होगी
मद्धम चाँद और तारों को कब......
              ........नसीब अपनी रौशनी होगी
अंजाना सा डर है मुझे.......
   ........फिर भी चाहूँ दिल से दुआ दे तू मुझे
याद शहर से संग आई.......
               ........ तू ही बची एक करीबी है 
दिनों बाद आई......फिर ये रात अकेली......

    

Tuesday, July 14, 2020

Sookhe Patte....

सूखे पत्ते....कहते है अनूठा अंग हूँ मैं
पेड़ का जो रहे कभी 
पेड़ से जुड़ा कभी जमीं पे पड़ा 
आज़ाद होने की चाहत में अकसर 
आशियाँ छोड़ अपना हवाओं 
संग लावारिश बन उड़ता फिरा !!

टहनियों से संग क्या छूटा
धूप छाँव से भी रिश्ता टूटा   
हर मौसम ने यूँ मुख मोड़ा
हर साख़ ने कुछ इस तरह दिल तोड़ा 
पड़ा महँगा घर छोड़ना
अपनी शर्तों पे लहरों से नाता जोड़ना !!

यू हि बेख़बर उड़ चला था मैं  
इश्क़ की बारिश में 
अल्हड़ सा हो गया था मैं 
अंजाम -ए- सफ़र क्या हो मालूम नहीं 
मंज़िल से भी रूठ कहीं बैठा था मैं !!

देखा न था सूखे पत्ते को 
इश्क़ करते कभी टूट के यूँ बिखरे
जैसे जमीं की सजावट हो कोई  
सूखे अल्फ़ाज़ है ये ज़र्द पड़े जज़्बात है ये 
देखा है अकसर समेट इन्हें  
आग के हवाले करता है अपना ही कोई !!     

Thursday, July 09, 2020

Lo Phir Aayii.....

लो फिर आयी......तेरी यादें लगी बढ़ने बेचैनियाँ रातों की,
सुना है मैंने कई किस्से, तेरे मेरे जज़्बातोँ के,
तुम आओ तो तुम्हें कह दूँ, होता नहीं अच्छा
आदत हो गर देर से आने की !!

सच है ये.......सही चाहत हो गर, फ़र्क पड़ता नहीं,
तय किए कितने मिलों का सफ़र,
सुनी पड़ी राहें खोल के बाहें, करें गुज़ारिश बीते
लम्हों को फ़िर से गुजरने की !!

सुन लेती है.........ये अकसर वो सदायें भी
मुमकिन नहीं जिनका, तसव्वुर में आना भी,
लो हुई शाम भी भाड़ी, करवटों में गुज़री रात सारी 
सोचूँ जब भी दिल को बहलाने की !!

होता नहीं आसां.......बिखरे अल्फ़ाज़ों को समेटना,
लगे यूँ जैसे पुराने ज़ख्मों को कुरेदना,
रहता है साझे रिश्तों का मर्तबान खाली, है जरुरत 
नई यादें फ़िर इक बार सजोने की !! 


Monday, June 29, 2020

Dard Ka Sahar....

क़दमों के फासले से बंदिशों के दायरे कम किये
पीछा किया ताउम्र अनकहे लफ्जों का
जाने कब वो किसी और के हो लिए !!

आसां न था जाना उधर मालूम हो ये है "दर्द का शहर"

टूट कर उलझी वादों में रिश्तों की डोरी, 
सूखे जख़्म में सिर्फ़ जलन थी भरी,
ख़्वाब में अकसर दिखें छिपे काले साये, 
गहरे सन्नाटे उसे और करीब लाए !!

इक टुकड़ा बन आज भी सीने में वो नम सा है,
तेरा ग़म जो लगता कभी - कभी मरहम सा है, 
आदतन सोचूँ यू होता तो अच्छा होता,
गर आँखों से ही शख़्स कतल होता !!

पूछा कई दफा बेमन सजी इन आँखों से, 
सोचो तो क्या थे और क्या हो गए हम,
कहाँ खो गए राही तुम रफ़्ता - रफ़्ता,
पढ़ लेते थे बिन कहे ख़ामोशी भी तुम, 
दुनियाँ की दौड़ में चलना भूल गए आहिस्ता आहिस्ता तुम !!

इरादे है फिर से जीने के.........ज़िंदगी ढूँढ तू मुझे लेना,
इक बार फिर अपनी पनाह में रखना,
इस बार सिर्फ मेरे लिए आना !!

Wednesday, June 24, 2020

Phir Subah Hogiii...

माना राहें है पुरख़तर नहीं
और न रहीं आसान ज़िंदगी........
बैठे क्यों गुमसुम हो,करके बंद खिड़की सभी
गुज़रे वक़्त है बहुत,पर याद में ज़िंदा लम्हा नहीं 
शाम ढलती तो रोज़ है,पर सुबह मेरी होती नहीं !!

नभ में तारें पिघल - पिघल

रोशन करें आसमां का जहां........
लगा ग्रहण है सूरज को,फिर क्यों झुलस रही जमीं
उभर आए कितने दिनकर,बनकर कवि अभी
सोए है रस्तें फ़िर भी ऐसे,जैसे धूप मयस्सर हुई नहीं !!

तपते मरू पर चलते - चलते

नापी है हौसलों से सरजमीं.........
कहते है सोहबत से,शख्सियत निखरती है भली 
सूखे पड़े साख़ से,ऐज़ाज़ के फल तोड़ा है कभी 
जमी हो जहाँ बरसों की धूल,वहाँ बारिश भी ठहरती नहीं !!

सपनों को अपने मोहलत दो 

पल जो है पराये वो है गुजरने को.......... 
लेने दे कड़ा इम्तिहान,कर ऊँचा तू इरादों की उड़ान   
लाख शातिर मंसूबे रखें,चाहें कोई कितना ही सही
ढली शाम है आख़िर,फ़िर सुबह होगी ही कहीं !!

Wednesday, June 17, 2020

Yeh Raat.....

कितना गहरा अँधेरा उभरा 
सुनहरी शाम ढली नज़र आया 
फ़िर मन का सूना कमरा 
सूखे - सूखे जज़्बात
अधूरे बंद पड़े ख़्वाब
तन्हाई की चादर ओढे 
पल - पल सरकती ये रात..........

क़तार लंबी है Shelf पर रखें किताबों की
कमी नहीं जिसमें अल्फ़ाज़ों की 
टूटे रिश्तें जोड़ू कैसे ?
अपने सपने पहचानों ऐसे !
भरे पड़े है पन्ने ऐसे कई जवाबों से
सुकूँ कहाँ लेकिन स्याही के 
इस ताने बाने से  
पल - पल समझाती ये रात..........

शिकायती नज़रों की फ़ेरिश्त से
ख़ुदको दूर रख चार लम्हें 
अपनों पर भी बर्बाद कर 
छिपे सवाल जो है तेरे उसे ज़ाहिर कर 
ज़ियादा की तवक़्क़ो नहीं 
बस आबो -ओ- दाना का ख्याल कर
पल - पल सिखाती ये रात...........

कहते है चंद दिनों का ये सफ़र 
बसते है मकां में चंद लोग 
भरोसा न कर ज़िंदगी का  
मरने लगे है इक दूसरे की वफ़ा में लोग 
दिलचस्प बात है ख़ता करके 
दिखाते ख़ुदको कैसे शर्मिंदा है ये लोग    
पल - पल कहती ये रात.......... 
  

Thursday, June 11, 2020

Safar....

ताउम्र मैं इक अजनबी साये से डरा
न चाहा फिर भी नज़र के दायरों में रहा !!

बेज़ान शरीर लिये भटका किया शहर - शहर
सोयी रही चौख़ट तेरी रूह से बंधा में रहा !!


इश्क़ नाम का परिंदा लिए आया दिल तेरे शहर
पर् रखा जमीं पर ख़्वाब आसमां में रहा !!


कुछ अक्स चुभने लगे ख़ुश्क पत्ते की तरह
ज़िंदगी भर दिल जिसकी बाग़वानी में रहा !!


चाँद की सोहबत में आज तारें भी रूठ गए
हो गया ख़ामोश मैं जहां अपनी चमक में रहा !!


गर्दिशें हालात थी या फिसला मेरा नसीब था
हर मोड़ अश्क गिरे फिर भी सूखा आँगन में रहा !!


वो जिस्म ही था जो लूट गया तुझे कमाने में
हृदये तो हमेशा तेरी अंजान चाहत में रहा !! 

Wednesday, June 03, 2020

Yaadon ki baarish.....


यादों की बारिश में......,
भीगा मन लगा है करने फरमाईशें,
बढ़ रहीं मुसलसल इसकी ख़्वाहिशें,
कुछ धुंधले चेहरे बन सवर आए जो थे सिर्फ़ ख्यालों में,

दुनियाँ के इस मजमें में माना तन्हा हर कोना है,
मयकदों से भरा यूहीं नहीं मयखाना है,
जरुरी नहीं हर तराना हो मुक़म्मिल jaana,
आसमां भी लगा यहाँ आधे चाँद की नुमाईश में,

रास न आया कभी तेरे रूह से महरूम होना मुझे,
पाने - खोने के ग़म से पल में उभरना मुझे,
भीगती है आज भी पलकें सर्द पड़े इश्क़ की जुदाई में,

तन्हा पड़ा रहा वजूद दाग़ -ए- उल्फ़त की खाई में,
सोचा रखूँगा मेहफ़ूज़ इसे सुनहरी याद की तरह,
बेसबब हुए चूर - चूर वक़्त की साज़िश में,

मुश्किल रहा पुरानी यादों का सफ़र,
ग़म जो सोया नहीं बताए कोई उसे जगाए किस तरह,
लब हो गए है ख़ामोश अल्फाज़ों की आज़माईश में,

यादों की बारिश में भीग....अकसर ख़ुद से दूर हुए..........  
तेरे इश्क़ की बेरोज़गारी से......फ़िर हम मशहूर हुए..........   


     
  

Sunday, May 31, 2020

Ek Mazdoor.....

शिक़ायत हो अगर मैं क्यों चुप चुप रहता हूँ,
शहरी आवोहवा से बस परेशां सा रहता हूँ,
हाथ की लकीरें अपनी मेहनत के
हथोड़ों से मिटाने को मज़बूर हूँ, 

फ़िर भी दुनियाँ की नज़रों से दूर हूँ, 
क्यूँकि मैं एक मज़दूर हूँ !!

बटी धरा हिस्सों में मेरे हिस्सें कुछ रहा नहीं,
ख़्वाबों में झूमते रहें लदी फसलों की आड़,
चौखट से रहीं बंधी अच्छे कल की आस,
आज दबे कर से इस धरती को
सिर्फ तकने को मज़बूर हूँ,

फ़िर भी दुनियाँ की नज़रों से दूर हूँ,
क्यूँकि मैं एक मज़दूर हूँ !!

दो जून कि जुगत में तप्ती धूप में झुलसा,
वक़्त के थपेड़ों ने भूख को प्यास से मारा,
हाथों में पड़े हैं सूखे छाले,
तब भी जुगाड़ नहीं कुछ शाम का,

फ़िर भी दुनियाँ की नज़रों से दूर हूँ,
क्यूँकि मैं एक मज़दूर हूँ !!

कहर बन बरसा जब भी आसमां,
आँधियों ने उड़ाया हमारा ही आशियाँ,
बेबसी पे कोशी भी हँसती रही,
अपने संग हमारे निशाँ मिटाती रही,
क़ुदरत से हर पल आज़माईश सी चलती रही,

फ़िर भी दुनियाँ की नज़रों से दूर हूँ,
क्यूँकि मैं एक मज़दूर हूँ !!

उलट गई तक़दीर जो बना मज़दूर, 
इससे बड़ी कोई सज़ा नहीं जहाँ
ज़ुर्म क्या है इसका पता नहीं,
कोशिश हज़ार करी अपनों के क़रीब रहूँ,

फ़िर भी दुनियाँ की नज़रों से दूर हूँ,
क्यूँकि मैं एक मज़दूर हूँ !!






Tuesday, May 26, 2020

Chalte Chalte.....

बेसबब मंज़िल दूर हुई चलते - चलते, 
ज़रा ठहर तो मांझी..........  
रह न जाए जीवन की साँझ कहीं ढलते - ढलते 
💘💘💘

ज़िंदगी है कुछ भूली, कुछ बिसरी बातें,
चंद पन्नों की सौग़ातें..........   
कितनी किताबें गढ़ी कौन जाने चुपके - चुपके
💝💝💝

हज़ारों किरणें बरसी उजाले की आस में,
मुक़मल दिन होने की चाह में........  
परेशां है सूरज भी रोज निकलते - निकलते
 💖💖💖

सुलगती रेत है पानी की तलाश में,
नखरीली धूप है उदंड........  
कम कर घमंड कह गया बादल आज बरसते - बरसते
💫💫💫

नए मिज़ाज का शहर माना शिक़वे है बहुत,  
मसलें जमीं के है..........
न रख दिल में असर फासले मिटेंगे तभी शहर - शहर
💕💕💕

दुनियाँ के लिए आज मुहाज़िर हूँ सो,  
मायूस भी हूँ ख़ामोश भी हूँ..........
मज़हबी शील देख रुके कदम फ़िर चलते - चलते 
💞💞💞

Sunday, May 24, 2020

Mann Ka Bojh...

उम्मीद का दीया जला बूढ़ी आँखें देखें रस्ता,
छवि अपनों की हर राहगीर में तलाशती......,

मुंडेर पर बैठ मायूस परिंदे को आहती, 
हर आहट पे नज़रे जैसे चौखट सवारती !!

झुकी कमर, लदी पलकें, झुर्रियाँ में छिपी, 
ज़िम्मेदारी की परतें.........,

अपनों की "बोझ" से दोहरा हुआ ज़िस्म,  
फ़िर भी वो हँसती रही,
सबकी ज़िंदगी सुकून से,
यूँ ही नहीं गुज़रती रही......, 

क़ैद जिसमें तेरे बचपन की तिजोड़ी है,
खोली आज मैंने फिर वो अँधेरी कोठरी है........,

बेज़ान पड़ी दीवारों से गूँज रही तेरी तोतली बोली,
टूटी सुई देख लगे, वक़्त ठहरी आज भी वहीं......
जैसे - तैसे दिन गुज़रते, पर हर साँझ लगे गहरी बड़ी  !!

यूँ तो बेकरवट बीती कई रातें, आधी गुज़री, 
और आधी निहार कर काटी........., 

पहलू में रख जिसे कई दिन फ़ाक़े बिताये, 
सोचा न था, आज वो आँचल झुलसा होगा...... 
कभी "माँ" को भी, एक फरियादी बनना होगा !!





Friday, May 22, 2020

Mere Ahsaas....

चार दीवारों में क़ैद थी सारी मस्तियाँ,
इज़ाज़त कम थी जीने की फिर भी,

सस्ता लगा साँसों को थामना,

मिली फुर्सद तेरे ग़म को महसूस करने कि,
शिकायतों का दौर चला और रात सोते -सोते रह गई !!

आँखों का सपना नहीं जो पल में खो जाऊ,

खोलूँ पलकें देखूँ चाँद और तारों में गुम हो जाऊ,

दर्द का रिश्ता है ये लिपटा जो अंजुमन से तेरे,

आहिस्ता -आहिस्ता चल ए ज़िंदगी, 

एहसास अभी बाकि है मेरे, 

दौर -ए- इश्क़ में बन चले थे कई हमदर्द

बिगड़ी मुक़द्दर से बात और दूरी हर हम से हो गई !!

ताउम्र लफ्जों का पीछा करता रहा, 

दर्द अल्फ़ाज़ बन कागज़ पर बिछता रहा,

अहद बीतें लम्हों से क्या रखूँ, 

उलझे किरदारों से ज़िंदगी साझा करता रहा, 

पल -पल ढली पूरी ज़िंदगी और हसरतें अधूरी रह गई !!

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