Wednesday, June 24, 2020

Phir Subah Hogiii...

माना राहें है पुरख़तर नहीं
और न रहीं आसान ज़िंदगी........
बैठे क्यों गुमसुम हो,करके बंद खिड़की सभी
गुज़रे वक़्त है बहुत,पर याद में ज़िंदा लम्हा नहीं 
शाम ढलती तो रोज़ है,पर सुबह मेरी होती नहीं !!

नभ में तारें पिघल - पिघल

रोशन करें आसमां का जहां........
लगा ग्रहण है सूरज को,फिर क्यों झुलस रही जमीं
उभर आए कितने दिनकर,बनकर कवि अभी
सोए है रस्तें फ़िर भी ऐसे,जैसे धूप मयस्सर हुई नहीं !!

तपते मरू पर चलते - चलते

नापी है हौसलों से सरजमीं.........
कहते है सोहबत से,शख्सियत निखरती है भली 
सूखे पड़े साख़ से,ऐज़ाज़ के फल तोड़ा है कभी 
जमी हो जहाँ बरसों की धूल,वहाँ बारिश भी ठहरती नहीं !!

सपनों को अपने मोहलत दो 

पल जो है पराये वो है गुजरने को.......... 
लेने दे कड़ा इम्तिहान,कर ऊँचा तू इरादों की उड़ान   
लाख शातिर मंसूबे रखें,चाहें कोई कितना ही सही
ढली शाम है आख़िर,फ़िर सुबह होगी ही कहीं !!

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