वो आई थी पास मेरे
चंद लम्हें थी साथ मेरे
हाथों में थे हाथ पड़े
चुड़ियों में थे जज़्बात सजे,
💑
ख़ामोश सज रहे थे लट
खुल न रहे थे लब
जैसे बंधे पड़े थे सारे शब्द,
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क्या ऐसा भी हो सकता है
लबों के साथ - साथ
शब्द भी सुख सकता है,
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गुमसुम चुपचाप सी
ऐसी तो न थी पहले खुशी,
👩
जब तक तेरे संग रहा
नासमझ बन दर्द में भी सर्द रहा,
💕💕
पल रही पहलू में जो ख़ामोशी है
किसे कहूँ कौन इसका दोषी है,
💗💗
आँखें है ये तेरी या आईना
फितरत साफ - साफ झलकते है
इनके भी होते अपने करिश्में
सूरज में भी दीखते आज धब्बे है,
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होके भी आज तू संग नही
हाथ तो है पर साथ नही,
लगता है बुत बनने की आई आज अर्ज़ी है
और बनके काफ़िर कहते है ख़ुदा की मर्ज़ी है !!
💔💔💔💔
