Saturday, November 16, 2024

Jaa...Rahi Thi Mein

कितना अलबेला है संसार.......,  

उबड़ खाबड़ पगडण्डियाँ  

शरद से सुखी पड़ी है सारी डंडियाँ,

लो हो गई नए रुत की शुरूवात    

लगने लगी फिर ओसों की कतार !! 

नख सिकोड़ती, हर कदम से जमीं को टटोलती,

अक्स को अपने बूँदों में कहीं तलाशती  देखे  

जा रही थी मैं..........,  

आसमां के नीचे, नन्हीं किरणों से बचते

खुद को आँचल में जमीं के सिमटते देखे 

जा रही थी मैं............,

ये सोंधी मिट्टी की खुश्बू , जिसमें इत्र सा जादू

धीरे धीरे ही सही, अपने नसों में घुलते इसे देखे 

जा रही थी मैं............, 

आँखें खोलूँ या बंद रखूँ या और थोड़ा सब्र रखूँ 

इस बगियाँ में आज भी, खुदको ही अकेला देखे

जा रही थी मैं............., 

लगा हर तरफ है होड़, था मगर ये जज़्बातों का शोर

चाहा बहुत रहूँ बेअसर, फिर भी आ जाते है नज़र ये देखे

जा रही थी मैं.............,  

मिली फुर्सत न मुझे मेरे भँवर से, न जाने कब से इनसे घिरी हूँ, 

साल दर साल परत दर परत, सीलन सी इनमें पड़ी खुद को देखे  

जा रही थी मैं.............,   

💝💝💝

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