सब्र हर बार .....अख़्तियार किया !
हमसे होता नहीं....हज़ार किया !!
आदतन तुमने कर दिये....वादे !!!
आदतन हमने...ऐतबार किया !!!!
बिकती है ना ख़ुशी कहीं,
ना ही कहीं ग़म बिकता है.....
लोग गलतफ़हमी में हैं.....
शायद कहीं मरहम बिकता हैं !!
लफ्जों की दहलीज़ पर जुबां घबराते हैं !
तन्हां लोग अक़सर महफ़िल से घबराते है !!
आरज़ू तो थी तेरे पहलू में शाम नहीं....ज़िंदगी गुज़रे !
बोझिल पलकें देखें....तेरे हि ख़्वाब सुनहरे !!
सब्र का हमने साथ न छोड़ा वक़्त ने लगाए कितने हि पहरे !!!
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