Thursday, March 09, 2023

Ek Shaam......

मन के मरू पर लगा है गिद्धों का पहरा, 
दिल की दहलीज़ खुली फिर चमका एक भरम का तारा,
जिस्मों के भीड़ में भटक रहा जाने कब से रूह अकेला !!

शहरी लिबाज़ में लिपटा देहाती रेत सा मन,
हर कदम में फिसलती, हर लहर से गुजरती,     
आशाओं के गलियारें में आकर सिमटती !!

दूर कहीं से देखता और कहता मन का किनारा,
ये समंदर के नहीं,......मन के उठे भंवर है,
जो स्थिर लहरों में भी,कई सवाल लिए खड़े है !! 
 
अशांत लहरों में भी सीप सा शांत यूँ  बैठना, 
अपनी नख से जमी पड़ी रेत को कुरेदना,
आती - जाती किरणों का जब हथेली से हो सामना !!

ऐसी कल्पनाओं की एक शाम......,  
इंतज़ार था जाने कब से इस दहकती शाम का,
हर शुष्क याद जिसमें जल जाए और ढल जाए,
नम आँखों में बन के काज़ल गहरा !!

ये एक शाम,..... ढ़लती चाहत के नाम कर दूँ ,
आँखों के सीप खोलूँ और हर बूँद को मोती कर दूँ ,
गुम हो जाए न ये लहर में कहीं, 
सारे के सारे आज इस समंदर के नाम कर दूँ !!
 

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