Thursday, May 20, 2021

Ek Baar Phir Se.....

उन्मुक्त हवाओँ में निराशाओं के पंख कतरती, 
आशाओं की मद्धम सी, लो सुलगाती, 
नयी इच्छाओं से आज.... क़ामिल है मन, 
एक बार फिर से......, 
पतंगों की रेस में...शामिल है मन !!

बरसों बाद मिली इसे राहत कैफ़ियत से, 
आने लगा सुकूँ, अब इबादत से,  
शहर की बेचैनियों से.... होके दूर, 
एक बार फिर से......, 
वीरानों की सिफ़ारिश...करने लगा है मन !!

नजरों संग तलाशती ये ज़र्द मिनारों को,   
जाने क्या कहानी छुपी, इन दीवारों में, 
कब से सोए है साये....इन दरारों में, 
एक बार फिर से......,  
पुकारने की गुज़ारिश....करने लगा है मन !!   

मौत और करवटों पर भरोसा न कर,
शिकायत कर, पर कोई शिक़वा न रख, 
उलझ न बंधनों में...थोड़ी रूह को राहत दे, 
एक बार फिर से......, 
चाहतो के परिंदे उड़ाने को....कहता है मन !! 
  

Thursday, April 15, 2021

Ek Khwaab....

बात है सीधी सी...... पर लगती है पहेली सी, 
जब भी ये आती है, रात करवट में कट जाती है, 
आँखों में बेचैनी की लहरें.......और धड़कन में, 
...........नई हरकत सी भर जाती है !!

💗💗💗
इसे सवारने को.....पड़ी सिलवटें हटाने को,  
जाने कब नज़रे आईना बन जाती है, 
बड़ी पाबन्द होती है पलकें...... फिर भी, 
रुक - रुक कर ये.....दिल को सलाम कर जाती है !!

💝💝💝
बस एक ख़्वाब है तू......... सिर्फ़ एक ख़्वाब....  
फिर क्यों ? ........ तेरे इंतज़ार में, 
ये पलकें टकटकी लगाये, घड़ियाँ निहारती रहती है,
........ तेरे सिर्फ़ जिक्र से,  
आते - जाते हर ख़्वाब को गिला कर जाती है !! 

💖💖💖
नहीं आता समझ मुझे, शिकायत करू या जाने दूँ,
या इन्हें जोड़ नई कहानी बुनूँ.........   
या बाकि सपनों की तरह, इसकी प्यास को भी, 
.......अपने अंदर मेहफ़ूज़ करूँ !!  

Sunday, March 28, 2021

Kagaz Ke Panne...

कागज़ के पन्ने जब देखती हूँ........., 
...... सफ़ेद साफ़, बिलकुल कोरी, 
हवाओं के संग उसकी ठिठौली.....याद दिलाती मुझे, 
अल्हड़, मनचली फिरकी.....पतंगें संग बंधी डोरी जिसकी,
अपने कोरेपन को भरना..... शब्दों के संग खेलना,
पन्ने चाहें अपनेपन से...... हमें बहुत कुछ कहना !!  
बिखेर यूँ खुदके हौसले नहीं.....,
........ देख मेरी तरफ,
कोई फ़र्क नहीं......तुझमें और मुझमें, 
किसमत अपनी तू....... ख़ुद लिख सकता नहीं, 
और मेरे खालीपन का........अपने हाथों कोई ईलाज़ नहीं, 
कब तक रहेगा उलझा....... दामन में लिए अँधेरों को, 
खोल दे मुट्ठी......साँस तो लेने दे चंद लकीरों को !! 
बहुत कर ली पलकें भारी....., 
....... भर चूँकि इनकी प्याली, 
पिछली रात की बारिश में, घुल गई है स्याही, 
रोक न अब 
इसे,..... बाहर आने दे, 
लफ़्जों का हर्फ़ बन,...... हर लाइन पर छाने दे, 
माना जीने के लिए,......
आँखों में सपने जरुरी है,
पर खुली निग़ाह रखने की, देनी पड़ी इन्हें मंजूरी है !! 
आख़िर में क्या कहूँ.........,  
ज़िंदगी की जद्दोज़हद से,......भरने लगा मेरा पन्ना है, 
सुना पड़ा है जो, वो कागज़ नहीं,.....इंसा के दिल का कोना है, 
कुछ यहाँ खोना है, और कुछ हि पाना है !! 
बाकि तो यहीं रह जाना है........., 


Sunday, January 10, 2021

Pahli Bhor.....

दिनों बाद.....फिर वही रात आई है 
बीत रही ये पहर आखिरी
तोड़कर अपनी निंद्रा गहरी,
टिक टिक सुन घड़ी धड़कन की  
बिन बात के पलकें भी फरकि,
एक बार फिर अँधियारे 
को सूरज मात देने वाला है, 
वक़्त का पहिया फिर 
नए सिरे से घूमने वाला है..........,
 
लगा रखी है सर माथे 
कुछ कच्ची कुछ पक्की 
यादों की पगड़ी, 
पास ही है बंधी पड़ी 
कुछ कही कुछ अनकही 
बातों की गठरी, 
दिल चाहें.....   
बंधन इनके न खोलूँ कभी 
चुप रहूँ न इस पर बोलूँ कभी, 
कौन जाने इस साल 
क्या पाकर खोने वाला है,
कुछ पल में ही नई सदी 
का आगाज़ होने वाला है.........,
   
ओढ़े बैठा है मन क्यों 
तू वही पुराने मैले कुचैले 
सोच से सिले चादर को 
निकाल इस मंथन से इसको 
कदम बढ़ा नज़रे उठा 
देख पूरब की ओर     
सुनहरे लिबास में लिपटा  
ओस में धुला फिर निकला नए साल की पहली भोर..........,  

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