हद - ए - शहर से निकली तो गाँव गाँव चली !!
कुछ यादें मेरे संग पांव पांव चली !!
सफ़र जो धूप किया तो तज़ुर्बा हुआ !!
वो ज़िंदगी ही क्या जो छाँव छाँव चली !!
औरत हि औरत की दुश्मन,... बन बैठी है यहाँ !
ख़ुदके अस्तित्व मिटाने में,.... खुद हि हाथ जला बैठी है यहाँ !!सफ़र जो धूप किया तो तज़ुर्बा हुआ !!
वो ज़िंदगी ही क्या जो छाँव छाँव चली !!
औरत हि औरत की दुश्मन,... बन बैठी है यहाँ !
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ReplyDeletethanks
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