Sunday, May 24, 2020

Mann Ka Bojh...

उम्मीद का दीया जला बूढ़ी आँखें देखें रस्ता,
छवि अपनों की हर राहगीर में तलाशती......,

मुंडेर पर बैठ मायूस परिंदे को आहती, 
हर आहट पे नज़रे जैसे चौखट सवारती !!

झुकी कमर, लदी पलकें, झुर्रियाँ में छिपी, 
ज़िम्मेदारी की परतें.........,

अपनों की "बोझ" से दोहरा हुआ ज़िस्म,  
फ़िर भी वो हँसती रही,
सबकी ज़िंदगी सुकून से,
यूँ ही नहीं गुज़रती रही......, 

क़ैद जिसमें तेरे बचपन की तिजोड़ी है,
खोली आज मैंने फिर वो अँधेरी कोठरी है........,

बेज़ान पड़ी दीवारों से गूँज रही तेरी तोतली बोली,
टूटी सुई देख लगे, वक़्त ठहरी आज भी वहीं......
जैसे - तैसे दिन गुज़रते, पर हर साँझ लगे गहरी बड़ी  !!

यूँ तो बेकरवट बीती कई रातें, आधी गुज़री, 
और आधी निहार कर काटी........., 

पहलू में रख जिसे कई दिन फ़ाक़े बिताये, 
सोचा न था, आज वो आँचल झुलसा होगा...... 
कभी "माँ" को भी, एक फरियादी बनना होगा !!





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