Sunday, May 31, 2020

Ek Mazdoor.....

शिक़ायत हो अगर मैं क्यों चुप चुप रहता हूँ,
शहरी आवोहवा से बस परेशां सा रहता हूँ,
हाथ की लकीरें अपनी मेहनत के
हथोड़ों से मिटाने को मज़बूर हूँ, 

फ़िर भी दुनियाँ की नज़रों से दूर हूँ, 
क्यूँकि मैं एक मज़दूर हूँ !!

बटी धरा हिस्सों में मेरे हिस्सें कुछ रहा नहीं,
ख़्वाबों में झूमते रहें लदी फसलों की आड़,
चौखट से रहीं बंधी अच्छे कल की आस,
आज दबे कर से इस धरती को
सिर्फ तकने को मज़बूर हूँ,

फ़िर भी दुनियाँ की नज़रों से दूर हूँ,
क्यूँकि मैं एक मज़दूर हूँ !!

दो जून कि जुगत में तप्ती धूप में झुलसा,
वक़्त के थपेड़ों ने भूख को प्यास से मारा,
हाथों में पड़े हैं सूखे छाले,
तब भी जुगाड़ नहीं कुछ शाम का,

फ़िर भी दुनियाँ की नज़रों से दूर हूँ,
क्यूँकि मैं एक मज़दूर हूँ !!

कहर बन बरसा जब भी आसमां,
आँधियों ने उड़ाया हमारा ही आशियाँ,
बेबसी पे कोशी भी हँसती रही,
अपने संग हमारे निशाँ मिटाती रही,
क़ुदरत से हर पल आज़माईश सी चलती रही,

फ़िर भी दुनियाँ की नज़रों से दूर हूँ,
क्यूँकि मैं एक मज़दूर हूँ !!

उलट गई तक़दीर जो बना मज़दूर, 
इससे बड़ी कोई सज़ा नहीं जहाँ
ज़ुर्म क्या है इसका पता नहीं,
कोशिश हज़ार करी अपनों के क़रीब रहूँ,

फ़िर भी दुनियाँ की नज़रों से दूर हूँ,
क्यूँकि मैं एक मज़दूर हूँ !!






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