Friday, May 22, 2020

Mere Ahsaas....

चार दीवारों में क़ैद थी सारी मस्तियाँ,
इज़ाज़त कम थी जीने की फिर भी,

सस्ता लगा साँसों को थामना,

मिली फुर्सद तेरे ग़म को महसूस करने कि,
शिकायतों का दौर चला और रात सोते -सोते रह गई !!

आँखों का सपना नहीं जो पल में खो जाऊ,

खोलूँ पलकें देखूँ चाँद और तारों में गुम हो जाऊ,

दर्द का रिश्ता है ये लिपटा जो अंजुमन से तेरे,

आहिस्ता -आहिस्ता चल ए ज़िंदगी, 

एहसास अभी बाकि है मेरे, 

दौर -ए- इश्क़ में बन चले थे कई हमदर्द

बिगड़ी मुक़द्दर से बात और दूरी हर हम से हो गई !!

ताउम्र लफ्जों का पीछा करता रहा, 

दर्द अल्फ़ाज़ बन कागज़ पर बिछता रहा,

अहद बीतें लम्हों से क्या रखूँ, 

उलझे किरदारों से ज़िंदगी साझा करता रहा, 

पल -पल ढली पूरी ज़िंदगी और हसरतें अधूरी रह गई !!

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