Showing posts with label Nature. Show all posts
Showing posts with label Nature. Show all posts

Thursday, January 26, 2023

Poonam Ka Chaand....

  

क़िस्सा है पूनम की रात का.......,  

तारों के बीच बैठा,एक टुकड़ा चाँद का,

सबकी नज़रों से दूर है वो......,

पास होकर तारों के भी,खुद में मसरूफ है वो,

रोज़ ये आता है,यूहीं घाट लगाता है,

आज क्या बात है....क्या दिन कोई ख़ास है,

कभी आधा,कभी पूरा और आज तो,

पलक झपके बिना कर रहा दीदार वो,

जैसे लगता है धरा पर करने आया,

दिनों बाद फिर से अमृत पान वो....., 

तन्हा सांझ और सुखा कली का हर दुकान,

आँखों की शरा से ज़रा सी टपकी नमी और देखो खिल उठा नमी का चाँद,

चंद टुकड़े इसके,आओं बंज़र जमीं को बाँट दे,हर कली का ये माथा चूमें,इतने दिन जाने विरह के कैसे बीते, 

                          आज इस पल में सब बातों को विराम कर दे,

                       चलों ये रात,जुगनूओं,परो और परिंदों के नाम कर दे......,   



                                                                                                         


                    

 


Monday, October 03, 2022

Sawan Ki Ek Shaam.......

लो फिर से घनघोर अँधेरा छाया,
फिर छाई बदली की माया, 
जाने किस डर से....धर भरमाया,
बिन माँगे यहाँ किसने कुछ पाया.........  

अपने कोतुहल को शांत कर, 
कदमों की गति ज़रा थाम कर,  
देखा जब अपनी मुँडेर, 
जहाँ बैठा एक बटेर, 
तिनके लिए जो घनेर, 
एक - एक को तोड़मड़ोड़,
बांध रहा घर की मोड़..........,  

जाने क्या सोच रहा, 
हर तिनके को साध रहा, 
जाने कब से उस पर,  
आसमां भी आज छींक रहा.........,

अपने पर की छतरी ताने, 
सावन से वो दो चार हुआ,
एक पल को लगा मुझे, 
आज ये परिंदा नाक़ाम हुआ.........,

गिरती हर बूँद लगे,
जैसे,तीर कमान से पार हुआ,
खारेपन से इसके, 
परों को भी ये एहसास हुआ.........,      

आज ये मिलने धरती से नहीं,
कुछ और भी रंज़ दिल में लायी है,
भिगोने सिर्फ पत्तों को नहीं, 
परों के हौसले तोड़ने भी आयी है !!  

Wednesday, September 30, 2020

Dekh Rahi Hoon Mein.....

दिनों बाद लगा एक ख़्वाब देख रही हूँ मैं.......
पल को दिन...... दिन को साल में 
वक़्त की खाल ओढ़े 
सूरज को पल - पल 
बदलते अपनी चाल देख रही हूँ मैं........,
 💫💫
पहाड़ों को करते पहरेदारी 
अंबर को चुराते लाली
तिरछी हरी घास पर लेटे
बेख़ौफ़ इस जहां से होके  
फिर एक बार 
आँखों से वफ़ा खोज रही हूँ मैं...........,
 💫💫  
भोर हुई सूरज निकला 
ओस के पाँव ने जमीं कुरेदा 
सोंधी - सोंधी ख़ुश्बू बिखरी 
हर कली ने अपना पट खोला
बांधा कई बार इन नज़ारों ने 
पर लगता है 
जमीं से नाता आज जोड़ रही हूँ मैं........, 
💫💫 
बंदिशों के घेरों को 
पार कर निकले थे  
मन के परिंदे 
बेपरवाह हो उड़ चले थे
तेज़ हवाओं को कर अनदेखा
ऊपर बादलों के बीच जा बैठे थे 
सुने आसमां के आँगन को 
खाली पड़े मन के गागर को 
फ़िर बूँदों से दामन भरने की सोच रही हूँ मैं.......,
💫💫  
मोल नहीं इस दृश्य का 
यहाँ मन का विकार भी 
बेकार हुआ
भरी दुपहरी में जब 
अँधियारा उजाले से 
पार हुआ
आओं अपने परों को खोलें     
और आसमां के पर् निचोड़े 
पहली दफ़े 
बारिश में आज 
ख़ुदके और जमीं के भरते ज़ख़्म देख रही हूँ मैं.......,   
 

Thursday, September 10, 2020

Chal Wahan Jaate Hain....

चल वहाँ जाते है..........,
  
जहाँ खुली बाहें पसारे ये प्रकृति हमें पुकारे, 
आँखों की प्यास बुझाने को ओस नित करे इशारे, 
इनकी पाक पनाह में आओ फ़िर से 
सारे जहां को हम भूल जाते है !!
चल वहाँ जाते है..........,
  
जिन पहाड़ों की ओट से जमीं को झाँकती 
हर रोज सुबह नज़र आती है,
सूरज से मर्म पाते हि जहाँ सूखे पत्ते भी 
हरे फ़र्श पर सोने सा चमक जाते है !!
चल वहाँ जाते है..........,
  
नीले आँचल की छाँव में लेटकर सारी 
क़ायनात एक नज़र आती है,
नभ के तारें जहाँ अकसर जमीं हाथ बढ़ा तोड़ जाती है,
दुनियाँ से कटकर जहाँ खुद से जुड़ हम जाते है !!
चल वहाँ जाते है..........,  

हवाओं की बदली रुख से रुखसत 
होती जहाँ बरसात है, जिसकी हर बूँद में 
अपना अक्स नज़र आता साफ़ है, 
बादलों के बीच जाकर चलो हम नदियों में नहाते है !!
चल वहाँ जाते है..........,

ख़्वाब देखे जहाँ आसमां संग होने की जमीं, 
सतरंगी सपने जहाँ रोज खिलाए हर कली,
सावन की राह में कलियाँ जहाँ गुलमोहर सी हो सजी,
बारिश की सुगबुगाहट जहाँ आहट सावन के दे जाते है !! 
चल वहाँ जाते है..........,

Tuesday, July 14, 2020

Sookhe Patte....

सूखे पत्ते....कहते है अनूठा अंग हूँ मैं
पेड़ का जो रहे कभी 
पेड़ से जुड़ा कभी जमीं पे पड़ा 
आज़ाद होने की चाहत में अकसर 
आशियाँ छोड़ अपना हवाओं 
संग लावारिश बन उड़ता फिरा !!

टहनियों से संग क्या छूटा
धूप छाँव से भी रिश्ता टूटा   
हर मौसम ने यूँ मुख मोड़ा
हर साख़ ने कुछ इस तरह दिल तोड़ा 
पड़ा महँगा घर छोड़ना
अपनी शर्तों पे लहरों से नाता जोड़ना !!

यू हि बेख़बर उड़ चला था मैं  
इश्क़ की बारिश में 
अल्हड़ सा हो गया था मैं 
अंजाम -ए- सफ़र क्या हो मालूम नहीं 
मंज़िल से भी रूठ कहीं बैठा था मैं !!

देखा न था सूखे पत्ते को 
इश्क़ करते कभी टूट के यूँ बिखरे
जैसे जमीं की सजावट हो कोई  
सूखे अल्फ़ाज़ है ये ज़र्द पड़े जज़्बात है ये 
देखा है अकसर समेट इन्हें  
आग के हवाले करता है अपना ही कोई !!     

Sunday, May 17, 2020

Bargad Ka Ped....

सालों बाद नींद से जागा शहरी दरवाज़ा खुला 
फ़िर गांव की ओर भागा............   
मुड़ कर देखा वहीं बरगद का पेड़
जो जमीं को जकड़े गांव की सीमा
पर आज भी चौकीदार बना खड़ा था !!
सूरज की गर्मी जला रही थी काया 
निकट थी इसके तरुवर की छाया !!

दो पल को ठहरा लगा वह मुस्कुरा रहा
और मेरा दर्द जो कहीं खो रहा !!
गुज़रे वक़्त की मिट्टी बैठ पैरों से कुरेद रहा
उसकी जमी जड़ों में अपनी ज़मीर तलाश रहा !!

ज़िंदगी जब वक़्त की मोहताज़ न थी 
सूरज में भी इतनी आग न थी !!
अम्बर धरा में लगती न थी दूरी 
होती कहाँ थी बचपन में मज़बूरी !!

लहरों से लड़ती नाव ढूँढ़े जैसे किनारा
भटके मन को मिला तेरे पास सहारा !!
सूखी झूलती ये बेलियाँ जो सदियों बाद
मुझसे मिल रही और कह रही............
    
गर्मी तो मौसम में है तू रिश्तों में लिए बैठा है 
काबिल बनने कि होड़ में तू क़ामिल बन ऐठा है 
मैं आज भी यहीं हूँ जो तेरा बचपन सजोए बैठा है !!


Wednesday, April 22, 2020

Lafangey Parindey......

चादर सी बिछी तारों के बीच चाँद भी अकेला हैं,

खुले आसमां में लगा, बादलों का डेरा है,

हर परिंदा जहाँ होता अकेला है,

करने दो परो को नादानियाँ,

बची है आसमां की कुछ आज़ादियाँ,
  
तेरा शहर है ये, परो को राहत दो...........  

लफंगे परिंदे है ये, इन्हें उड़ने दो........

वक़्त रुख़सती का हुआ नहीं, सूरज भी थका नहीं,

सिमटी नहीं लहरों की अंगराई है, 

टहनियों से अभी शाम ढलाना बाकि हैं,

जमीं पर मचा अंजाना कोहराम हैं,

बाकि अभी भी आसमां के अरमान है,

तेरा शहर है ये, परो को राहत दो..............
  
लफंगे परिंदे है ये, इन्हें उड़ने दो........ 

बेनाम सा शहर ये ठहर क्यों नहीं जाता, 

फैला विष आँगन में मेरे कम हो जाता, 

मुझ पर भी तू रहम कर दे ,

रुक कर मेरे ज़ख़्मों पर मरहम कर दे ,

अपने परो से इनपर हवा कर दे ,

तेरा शहर है ये ,परो को राहत दो...............
   
लफंगे परिंदे है ये, इन्हें उड़ने दो........ 





Monday, April 06, 2020

Suna Shajar.....


हर साख़ पे शिकारी पाबंद है फ़िर भी बेख़ौफ़ परिंदा हैं !!

मेरे आँगन में लगा शज़र आज खामोश खड़ा हैं !


जड़े हो गई खोखली,आशिया परिंदों का खाली पड़ा हैं !


सुनहरी धूप से होती पत्तों की रंगाई !


काक की बेबाक़ बोली से साख़ लेती अंगराई !! 


ओस की बुँदे जब अंग - अंग धोये !


पत्ते अपनी -अपनी आँखे खोले !! 


रोज़ का आलम आज जाने क्यों रूका हैं !


किस बात से इस घर का परिंदा ख़फ़ा हैं !! 


चिराग़ों की तरह साख़ जले, चाहें जल्द शाम हो जाए !


परिंदा आसमां छूने में, नाक़ाम हो जाए !!


करवट ले मौसम पतझड़ फ़िर, नर्म सर्द हो जाए !


सूना शज़र फ़िर एक बार, परिंदों का शहर हो जाए !!


Monday, March 02, 2020

Baarish.....


इस बार थोड़ा जल्दी आना........,
  
फ़ैली नफ़रत और रंजिश की...... आग, 

हर तरफ़ डेरा जमा...... जैसे ज़हरीला नाग,

करना तुझे है......  विष का पान !!!

बारिश...... इस बार तू जल्दी आना 💧💦💧💦

खेतों की पगडण्डीओं पर......  बैठा एक मज़दूर 

किसान भरनी है..... जिसे बंज़र जमीं की लगान !!!

बारिश...... इस बार तू जल्दी आना 💧💦💧💦

रोड़े पड़े है राहों में..... उलझन के..... उनसे भी 

दो चार करना....... अपनी मुस्कुराहट से कुछ

सुक़ून के लम्हात भी...... अदा करना !!!

बारिश...... इस बार तू जल्दी आना 💧💦💧💦

तन्हां रातों में...... इंतज़ार भड़ी निग़ाहों को,

अपनी लज्ज़त से....... महरूम न करना, 

इनकी ख़ैरियत.......भी मालूम करना !!

बारिश...... इस बार तू जल्दी आना 💧💦💧💦

कोशिशें बेहिसाब की...... सोए सपनों को जगाने 

कि.... अपनी आहटों से...... इनपर भी मद्धम

सी बरसात करना  !!!

बारिश...... इस बार तू जल्दी आना 💧💦💧💦

हथेलियों को चूम..... बैठ मेरे संग......रात अपनी 

बेज़ार करना...... इस सावन सब पावन करना  !!!

बारिश...... इस बार तू जल्दी आना 💧💦💧💦
  




Thursday, February 06, 2020

O ri....pawan...



ओ री पवन.........चूम के गगन, 

करती तू अटखेली क्यों है......., 

साँझ की चादर बिछी सड़कों से भोर तक,

नदी की धार सी.......तू मचलती क्यों है....., 

सूखे मैदानों में, लेटे बेज़ान पत्थरों से, 

तू जा - जा बतियातीं क्यों है........,  

छाई मौसम की घटा, रोशन हुआ हर दिशा, 

हर रुत की......तू लगती सहेली क्यों है......,  

नींद भरी पलकों से, छटा यादों का पहरा,  

अरमानों का झूला.......तू झुलाती क्यों है....,

यादों की गठरी बना, छोड़ आयी जिस दहलीज़,

संग -संग अपने,.....तू अहसास वो लाती क्यों है....,

इन्सां के पीर में, खंडहर सि हृदय में ,

गूंगी हि सही पर......तू गुण -गुणाती क्यों है.....,

कर्म का पेड़ लगा, हाथ जोड़ जब माँगी दुआ,

पेड़ - पौधे, जीव - जंतु, सबके लिए.......तू है क्यों अनमोल दवा !! 


Thursday, December 05, 2019

"Mere mohalleh mein"

                                       
        

                                              Koi kahta hai...tu paharon se nikalti haiii..
  
           koi kahta hai...tu samundar pe milti haiii...

Mere hone ka ahsaas hota hai mujhko... tu jab chhukar gujarti haiii

Suna hai mere mohalleh mein, tera roj ka aana jana haii..

tera thikana bhi hai koi.. ya tu bhi meri tarah begana haii..

Fahrisht lambi hai..shikayaton ki, jo aaj tujhe sunana haii..

Suna hai mere mohalleh me tera roj ka aana jana haii..

Bash ye na kahna aaj nahi , kal nahi ya kisi aur se milne jana hai..

Bahane hai ye sare aamlogo ke...insab se tu toh anjana haii..

suna hai mere mohalleh  me tera roj ka aana jana haii..

Phir kyu aaj  oosh ki chadar se , khud ko chhupaya haii..

Kya tujhe bhi aaj khud pe , guma ho aaya haiii..

suna hai mere mohalleh me tera roj ka aana jana haii...



  




Recent Post :-

Sabse Haseen Alfaaz Ho Tum....,

कैसे बताऊ तुम्हें मेरे लिए तुम क्या हो ? 💕 मस्जिद की पहली अज़ान हो तुम,  माँगा जिसे रोज़ दुआओं में हम , रात सिरहाने खुले थे जो ख़्वाब,  उसकी ह...

Most Loved Hindi Poetry :-