Thursday, February 06, 2020

O ri....pawan...



ओ री पवन.........चूम के गगन, 

करती तू अटखेली क्यों है......., 

साँझ की चादर बिछी सड़कों से भोर तक,

नदी की धार सी.......तू मचलती क्यों है....., 

सूखे मैदानों में, लेटे बेज़ान पत्थरों से, 

तू जा - जा बतियातीं क्यों है........,  

छाई मौसम की घटा, रोशन हुआ हर दिशा, 

हर रुत की......तू लगती सहेली क्यों है......,  

नींद भरी पलकों से, छटा यादों का पहरा,  

अरमानों का झूला.......तू झुलाती क्यों है....,

यादों की गठरी बना, छोड़ आयी जिस दहलीज़,

संग -संग अपने,.....तू अहसास वो लाती क्यों है....,

इन्सां के पीर में, खंडहर सि हृदय में ,

गूंगी हि सही पर......तू गुण -गुणाती क्यों है.....,

कर्म का पेड़ लगा, हाथ जोड़ जब माँगी दुआ,

पेड़ - पौधे, जीव - जंतु, सबके लिए.......तू है क्यों अनमोल दवा !! 


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