लिखने को आज अल्फ़ाज़ ही नहीं हैं,
तेरे ख्यालों में गुम हूँ कुछ इस तरह मैं,
गा तो रही हूँ आज भी पर वो साज़ ही नहीं है !!
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खुली किताब सा रखा था दिल ने तुझे,
जिसमें बसी थी तुम्हरी हर अदा,
पढ़ रही हूँ आज भी पर वो अंदाज़ ही नहीं है !!
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महफ़िल तो रोज़ लगती है तारों की,
फ़लक पर चाँद भी बिखेरता है चाँदनी,
निहारती आज भी हूँ पर वो नाज़ ही नहीं है !!
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तेरे जाने के बाद कुछ यूँ बदली हूँ मैं,
यकीं नहीं आईने को भी लोगों के बीच,
हँस तो रही हूँ पर वो आवाज़ ही नहीं है !!
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धड़कनें चल रही है साँसें भी बाकि है,
शायद तेरे बिना एहसास ही नहीं,
जी तो रही हूँ पर जीने का आग़ाज़ ही नहीं है !!
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आज लिखने को अल्फ़ाज़ ही नहीं है,
जो कभी तेरे नाम से शुरू होती थी,
अब पास न कोई अंत, कोई परवाज़ ही नहीं है !!
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तेरे सिवा अब आता कोई ख़्वाब ही नहीं !
तुझे भूल जाने का अब कोई सवाल ही नहीं !!
