Wednesday, July 15, 2026

Arthavyavastha Ke Aaine Mein Bharat..,

सड़कों पर दौड़ती भीड़ की रफ्तार कहती है,

देश आगे बढ़ रहा, हमारी सरकार हमसे कहती है,

ऊँची - ऊँची इमारतों के शीशों में,

विकास निरंतर आगे बढ़ रहा,

कितने लोग है जिन्हें सच नहीं दिख रहा,

चमक रहे शहरों में मॉल और बाज़ार जहाँ, 

खेतों में सिसक रहा किसान यहाँ,

डिजिटल इंडिया की लहर में, डूब रहा हर एक शहर,

पर मज़दूर के चूल्हें में सुलग रही चिता की दोपहर,

बढ़ती जीडीपी के आँकड़े, शेयर बाज़ार के अंक,

अख़बारों की शान तो बढ़ाते हैं,

पर रोज़गार की तलाश में, कितने युवा भटक जाते हैं,

मॅहगाई की रेखा रोज़, छूती नए आसमानों को,

पर कौन सुनेगा, झुग्गी - झोपड़ी में बसने वाले इंसानों को ?

ज़रा ठहरकर गाँव की पगडंडी से भी पूछो,

सूखी पड़ी खेत की मेड़ों की भी कभी सुध लो,

हर मध्यम वर्ग की ये अनकही ज़ुबानी,

आँखों में उम्मीद और मन में लिए परेशानी,

रोज़ी की तलाश में, भटकते हर युवा की कहानी,

महंगाई की इस आँधी में, कितने सपने रोज़ बिखरते हैं,

हमारी रसोई जैसे निरंतर नए बजट में सिमटते हैं,

अर्थव्यवस्था केवल आँकड़ों का खेल नहीं,

GDP की बढ़ती ऐसी रेखा का कोई मोल नहीं,

डिजिटल सपनों के इस युग में,

आर्थिक तरक्की की दौड़ में, हमें संतुलन बनाना होगा,

मशीनरी के इस दौर में, इंसानी हाथों को ताकत में लाना होगा,

जब तक हर थाली में, रोटी और हर हाथों में काम न होगा, 

कैसे कहें तब तक सोने की चिड़िया का सपना साकार होगा !!  


Saturday, July 04, 2026

Mein Badal Rahi Hoon....,

वक़्त के पन्ने पलट कर इसे जाया न कर, 
इक रोज़ सब बदल जायेगा, 
पर ज़िंदगी की कहानी यूँ ही चलती रहेगी, 
बीते वक़्त की किताब से,
आज भी बेनाम रिश्ते निभा रही हूँ,
मैं बदल रही हूँ........,
माना कुछ ख़्वाब अधूरे रह गए,
कुछ लोग भी रास्तों में बिछड़ गए,
मगर टूटे हुए उन टुकड़ों से, 
मैं अपना ही आसमान गढ़ रही हूँ,
मैं बदल रही हूँ.......,
दिल पर दी गयी किसी की चोट का,
या फिर अपनों की कही कोई बात,
ये बात तो रोज का है मौसमी बरसात का, 
न ज्यादा न कम बस जरुरत भर,
जिंदगी से उसके तौर तरीके सिख रही हूँ, 
मैं बदल रही हूँ.......,
जो बातें कभी आँखों से बह जाती, 
अब अल्फ़ाज़ बनकर उतरती है,
मेरा हर दर्द ख़ामोशी से,
आज एक कविता में सँवरती हैं,
अब शिकायत नहीं आईने से,
उससे रोज़ मुलाकात कर रही हूँ,   
मैं बदल रही हूँ.......,
वक़्त ने बहुत कुछ छीन लिया, 
पर खुदको समझने का हुनर दिया, 
कभी मिलो मुझसे तो पहले सा न ढूँढ़ना,
मैं वहीं हूँ, पर ज्यादा ख़ुद जैसी हो रही हूँ,
"मैं बदल नहीं रही"
बस अब किसी और की नहीं, 
अपनी कहानी लिख रही हूँ !!



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