Saturday, August 08, 2026

Khamoshi Ka Loktantra...,

कहते है ये लोकतंत्र है...., 
जहाँ हर आवाज को मिला,पूरा गगन है, 
हर जुबां को मिला,बोलने का अधिकार, 
फिर क्यों, लंबी कतार उन शब्दों की है, 
जो जन्म से पहले खो बैठे,अपने अर्थ का आकार, 
लोकतंत्र की हार,बंद पड़ी मतपेटियों में नहीं, 
हमारे अंदर है -
जब प्रश्न पूछने से हमारी आँखें इधर - उधर, 
और उत्तर देने से पहले जहाँ, 
होठों को शब्दों की अनुमति लगती है, 
इन सब की शुरुवात घर से ही तो होती है, 
दादा की चुप्पी संघर्ष थी, 
पिता की चुप्पी कर्त्तव्य, 
हमारी चुप्पी सुविधा बन गई, 
पीढ़ी आगे बढ़ती रही,
और मौन अपना संविधान लिखता रहा, 
ज़िम्मेदारियों का भार शब्दों से,
जाने कब बड़ा हो गया, 
घर धीरे - धीरे समाज बन गया,  
बेटियाँ अपनी इच्छायें, 
डायरी के पन्नों में रखती गयी,
और बेटा असफलता पहनना सिख गया,
इतिहास बोलने वालों को याद रखता है, 
इसलिए, बाज़ारों में आवाज़ें बिकती है, 
चौराहों पर नारे गूँजते है, 
जो उम्र भर सुने जाने की प्रतीक्षा करते है, 
उन्हें कौन जानता है ?
लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं,
संवाद से जीवित रहता है, 
पर मौन, विवेक के हर प्रस्ताव को, 
बिना विरोध के खारिज कर देता है,
स्क्रीन पर सच लिखते - लिखते,
आज हारे चेहरे पढ़ना भूल गए, 
बोलना तो सीखा हमने,पर सुनना भूल गए, 
बोलने की आज़ादी तो,बचा ली हमने,  
पर लोकतंत्र की आत्मा को,ख़ामोश कर गए, 
यहीं से तो ख़ामोशी का लोकतंत्र शुरू होता है, 
इतिहास लिखेगा की लोग बोलते थे -
पर कोई यह भी लिखेगा क्या ?
की सुनने वाले कितने बचे थे ?


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