Monday, December 23, 2019

Zinda hoon abhi...


लिखना चाहता हूँ .....कुछ औऱ ही ....लिखा जाता है ....कुछ और ही ,

तुझे सब पता है, इतनी भी..... तू अनजान नहीं,
तेरे पते के चक्कर में, भूला ख़ुद का पता कई बार ही,

जब भी थक कर फ़र्श पर बैठा, हाथों में बस.....तेरा हाथ था, 
सारा जग इससे अनजान था, तू ना होकर भी....मेरे साथ था, 

छत पर पूस की....उस रात में, कुछ बात तो थी.....हमारे साथ में,

जब भी लगा खुद को,...संभाल लिया , तेरे लायक खुद को,....बना लिया,
मेरी नहीं...तेरी है...ये दुनिया, बातों -बातों में.....ये भी तूने जता दिया,

हर दिन गुज़रा ये  समझाने में, मज़ा नहीं एक दूजे को,....आज़माने में ,
कोशिश कर ले लाख तू....हाथ छुड़ाने में, वक़्त है अभी हमें....बिछड़ जाने में,

चुभते काटें यादों के रोज चुनता हूँ, खुद पे आज.....शर्मिंदा और ज़िंदा हूँ , 
किशमत देती नहीं ......मौक़ा  बार-बार है.....ज़िंदा हूँ अभी, 

तो कहती हो मिलना बेक़ार हैं !!!!















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