Saturday, December 21, 2019

Purana Makaan..

कभी जो थी.... खुशियों की दूकान  !!!
चाहें -अनचाहे  , उस राह  से  रोज  गुज़रता  हूँ  ,

और अनायस ही उस गली कि आखिरी मकाँ को घूरता हूँ ,

उसकी बेजान दीवारों को नहीं , अपनी नज़र से खुदको उससे तोलता हूँ ,

झरती हुई कलई ,टूटती दीवारे ,हर जर्रे से झांकते पौधे ,

अपने आख़िरी पड़ाव पर भी ,कितनो का जीवन समेटे खड़ा, और कह रहा......,
                             तुम्हारे दिल पर जमीं धूल सा ,पुराना हो गया !

                           अपनों को अपनों के साथ देखे, जमाना हो गया !!

वक़्त कि गिरी ऐसी गाज , सुना पड़ा हर कोना आज, 

कभी खेला करता था बचपन यहाँ, सबके खुशियों का... मैं था एक जहां , 

आज यहाँ विरानी सी छाई है, सपनों में जैसे आग किसीने लगाई है ,

शहर कि बदलती हवा से बेजाड़ हो गया ,आज फिर घर से ये......मकान हो गया !!!






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