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| कभी जो थी.... खुशियों की दूकान !!! |
और अनायस ही उस गली कि आखिरी मकाँ को घूरता हूँ ,
उसकी बेजान दीवारों को नहीं , अपनी नज़र से खुदको उससे तोलता हूँ ,
झरती हुई कलई ,टूटती दीवारे ,हर जर्रे से झांकते पौधे ,
अपने आख़िरी पड़ाव पर भी ,कितनो का जीवन समेटे खड़ा, और कह रहा......,
तुम्हारे दिल पर जमीं धूल सा ,पुराना हो गया !
अपनों को अपनों के साथ देखे, जमाना हो गया !!
वक़्त कि गिरी ऐसी गाज , सुना पड़ा हर कोना आज,
कभी खेला करता था बचपन यहाँ, सबके खुशियों का... मैं था एक जहां ,
आज यहाँ विरानी सी छाई है, सपनों में जैसे आग किसीने लगाई है ,
शहर कि बदलती हवा से बेजाड़ हो गया ,आज फिर घर से ये......मकान हो गया !!!
झरती हुई कलई ,टूटती दीवारे ,हर जर्रे से झांकते पौधे ,
अपने आख़िरी पड़ाव पर भी ,कितनो का जीवन समेटे खड़ा, और कह रहा......,
तुम्हारे दिल पर जमीं धूल सा ,पुराना हो गया !
अपनों को अपनों के साथ देखे, जमाना हो गया !!
वक़्त कि गिरी ऐसी गाज , सुना पड़ा हर कोना आज,
कभी खेला करता था बचपन यहाँ, सबके खुशियों का... मैं था एक जहां ,
आज यहाँ विरानी सी छाई है, सपनों में जैसे आग किसीने लगाई है ,
शहर कि बदलती हवा से बेजाड़ हो गया ,आज फिर घर से ये......मकान हो गया !!!

Awesome
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