Monday, June 29, 2020

Dard Ka Sahar....

क़दमों के फासले से बंदिशों के दायरे कम किये
पीछा किया ताउम्र अनकहे लफ्जों का
जाने कब वो किसी और के हो लिए !!

आसां न था जाना उधर मालूम हो ये है "दर्द का शहर"

टूट कर उलझी वादों में रिश्तों की डोरी, 
सूखे जख़्म में सिर्फ़ जलन थी भरी,
ख़्वाब में अकसर दिखें छिपे काले साये, 
गहरे सन्नाटे उसे और करीब लाए !!

इक टुकड़ा बन आज भी सीने में वो नम सा है,
तेरा ग़म जो लगता कभी - कभी मरहम सा है, 
आदतन सोचूँ यू होता तो अच्छा होता,
गर आँखों से ही शख़्स कतल होता !!

पूछा कई दफा बेमन सजी इन आँखों से, 
सोचो तो क्या थे और क्या हो गए हम,
कहाँ खो गए राही तुम रफ़्ता - रफ़्ता,
पढ़ लेते थे बिन कहे ख़ामोशी भी तुम, 
दुनियाँ की दौड़ में चलना भूल गए आहिस्ता आहिस्ता तुम !!

इरादे है फिर से जीने के.........ज़िंदगी ढूँढ तू मुझे लेना,
इक बार फिर अपनी पनाह में रखना,
इस बार सिर्फ मेरे लिए आना !!

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