Thursday, June 11, 2020

Safar....

ताउम्र मैं इक अजनबी साये से डरा
न चाहा फिर भी नज़र के दायरों में रहा !!

बेज़ान शरीर लिये भटका किया शहर - शहर
सोयी रही चौख़ट तेरी रूह से बंधा में रहा !!


इश्क़ नाम का परिंदा लिए आया दिल तेरे शहर
पर् रखा जमीं पर ख़्वाब आसमां में रहा !!


कुछ अक्स चुभने लगे ख़ुश्क पत्ते की तरह
ज़िंदगी भर दिल जिसकी बाग़वानी में रहा !!


चाँद की सोहबत में आज तारें भी रूठ गए
हो गया ख़ामोश मैं जहां अपनी चमक में रहा !!


गर्दिशें हालात थी या फिसला मेरा नसीब था
हर मोड़ अश्क गिरे फिर भी सूखा आँगन में रहा !!


वो जिस्म ही था जो लूट गया तुझे कमाने में
हृदये तो हमेशा तेरी अंजान चाहत में रहा !! 

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