Monday, October 03, 2022

Sawan Ki Ek Shaam.......

लो फिर से घनघोर अँधेरा छाया,
फिर छाई बदली की माया, 
जाने किस डर से....धर भरमाया,
बिन माँगे यहाँ किसने कुछ पाया.........  

अपने कोतुहल को शांत कर, 
कदमों की गति ज़रा थाम कर,  
देखा जब अपनी मुँडेर, 
जहाँ बैठा एक बटेर, 
तिनके लिए जो घनेर, 
एक - एक को तोड़मड़ोड़,
बांध रहा घर की मोड़..........,  

जाने क्या सोच रहा, 
हर तिनके को साध रहा, 
जाने कब से उस पर,  
आसमां भी आज छींक रहा.........,

अपने पर की छतरी ताने, 
सावन से वो दो चार हुआ,
एक पल को लगा मुझे, 
आज ये परिंदा नाक़ाम हुआ.........,

गिरती हर बूँद लगे,
जैसे,तीर कमान से पार हुआ,
खारेपन से इसके, 
परों को भी ये एहसास हुआ.........,      

आज ये मिलने धरती से नहीं,
कुछ और भी रंज़ दिल में लायी है,
भिगोने सिर्फ पत्तों को नहीं, 
परों के हौसले तोड़ने भी आयी है !!  

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