Wednesday, April 22, 2020

Lafangey Parindey......

चादर सी बिछी तारों के बीच चाँद भी अकेला हैं,

खुले आसमां में लगा, बादलों का डेरा है,

हर परिंदा जहाँ होता अकेला है,

करने दो परो को नादानियाँ,

बची है आसमां की कुछ आज़ादियाँ,
  
तेरा शहर है ये, परो को राहत दो...........  

लफंगे परिंदे है ये, इन्हें उड़ने दो........

वक़्त रुख़सती का हुआ नहीं, सूरज भी थका नहीं,

सिमटी नहीं लहरों की अंगराई है, 

टहनियों से अभी शाम ढलाना बाकि हैं,

जमीं पर मचा अंजाना कोहराम हैं,

बाकि अभी भी आसमां के अरमान है,

तेरा शहर है ये, परो को राहत दो..............
  
लफंगे परिंदे है ये, इन्हें उड़ने दो........ 

बेनाम सा शहर ये ठहर क्यों नहीं जाता, 

फैला विष आँगन में मेरे कम हो जाता, 

मुझ पर भी तू रहम कर दे ,

रुक कर मेरे ज़ख़्मों पर मरहम कर दे ,

अपने परो से इनपर हवा कर दे ,

तेरा शहर है ये ,परो को राहत दो...............
   
लफंगे परिंदे है ये, इन्हें उड़ने दो........ 





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