Sunday, April 26, 2020

Ek shehar.....

एक शहर, एक मोहल्ला
साथ - साथ जहाँ, पले - बढ़े थे हम !
रिवाज़ों से नहीं, दिल की जमीं से जुड़े थे हम !!

छनकर आती धूप, चुपके से शुभ - प्रभात बोले !

सुबह की अज़ान जब, नींद के परदे खोले !!

सबके मुख में मिश्री धोलें, माथें तिलक शोभे !

साँझ की आरती लिए, हर दर जब दिये जले !!

कौन हिन्दू, कौन मुसलमां
ये सोचने का वक़्त था कहाँ...........

सेवइयाँ और गुजियां की ख़ुश्बू में,
सजता हर शाम बाज़ार था !

कुछ रक़ीब पुराने, कुछ नये दीवाने
इसी बहाने जिनका गश्त गली में बार - बार था !!

यादों का कारवाँ लिए, फ़िर शहर -ए- सफ़र जारी हैं........
सुनी गलियाँ, फीके आज हर नज़ारे हैं !
आहट से खुलती है खिड़की, बंद पड़े दरवाजे हैं !!

ज़हरीली ऐसी हवा चली, घुट गई गली - गली !
रंगों की लड़ाई में, लुटी हर बाग़ की कली !!

यकीं होता नहीं, बचा कोई सगा नहीं, 
अपना वो शहर अब रहा नहीं !!

आसमां पर नहीं, जमीं पर यहीं था बसा.......... 
एक शहर........




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