Monday, April 06, 2020

Suna Shajar.....


हर साख़ पे शिकारी पाबंद है फ़िर भी बेख़ौफ़ परिंदा हैं !!

मेरे आँगन में लगा शज़र आज खामोश खड़ा हैं !


जड़े हो गई खोखली,आशिया परिंदों का खाली पड़ा हैं !


सुनहरी धूप से होती पत्तों की रंगाई !


काक की बेबाक़ बोली से साख़ लेती अंगराई !! 


ओस की बुँदे जब अंग - अंग धोये !


पत्ते अपनी -अपनी आँखे खोले !! 


रोज़ का आलम आज जाने क्यों रूका हैं !


किस बात से इस घर का परिंदा ख़फ़ा हैं !! 


चिराग़ों की तरह साख़ जले, चाहें जल्द शाम हो जाए !


परिंदा आसमां छूने में, नाक़ाम हो जाए !!


करवट ले मौसम पतझड़ फ़िर, नर्म सर्द हो जाए !


सूना शज़र फ़िर एक बार, परिंदों का शहर हो जाए !!


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