Tuesday, July 14, 2020

Sookhe Patte....

सूखे पत्ते....कहते है अनूठा अंग हूँ मैं
पेड़ का जो रहे कभी 
पेड़ से जुड़ा कभी जमीं पे पड़ा 
आज़ाद होने की चाहत में अकसर 
आशियाँ छोड़ अपना हवाओं 
संग लावारिश बन उड़ता फिरा !!

टहनियों से संग क्या छूटा
धूप छाँव से भी रिश्ता टूटा   
हर मौसम ने यूँ मुख मोड़ा
हर साख़ ने कुछ इस तरह दिल तोड़ा 
पड़ा महँगा घर छोड़ना
अपनी शर्तों पे लहरों से नाता जोड़ना !!

यू हि बेख़बर उड़ चला था मैं  
इश्क़ की बारिश में 
अल्हड़ सा हो गया था मैं 
अंजाम -ए- सफ़र क्या हो मालूम नहीं 
मंज़िल से भी रूठ कहीं बैठा था मैं !!

देखा न था सूखे पत्ते को 
इश्क़ करते कभी टूट के यूँ बिखरे
जैसे जमीं की सजावट हो कोई  
सूखे अल्फ़ाज़ है ये ज़र्द पड़े जज़्बात है ये 
देखा है अकसर समेट इन्हें  
आग के हवाले करता है अपना ही कोई !!     

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