Sunday, March 28, 2021

Kagaz Ke Panne...

कागज़ के पन्ने जब देखती हूँ........., 
...... सफ़ेद साफ़, बिलकुल कोरी, 
हवाओं के संग उसकी ठिठौली.....याद दिलाती मुझे, 
अल्हड़, मनचली फिरकी.....पतंगें संग बंधी डोरी जिसकी,
अपने कोरेपन को भरना..... शब्दों के संग खेलना,
पन्ने चाहें अपनेपन से...... हमें बहुत कुछ कहना !!  
बिखेर यूँ खुदके हौसले नहीं.....,
........ देख मेरी तरफ,
कोई फ़र्क नहीं......तुझमें और मुझमें, 
किसमत अपनी तू....... ख़ुद लिख सकता नहीं, 
और मेरे खालीपन का........अपने हाथों कोई ईलाज़ नहीं, 
कब तक रहेगा उलझा....... दामन में लिए अँधेरों को, 
खोल दे मुट्ठी......साँस तो लेने दे चंद लकीरों को !! 
बहुत कर ली पलकें भारी....., 
....... भर चूँकि इनकी प्याली, 
पिछली रात की बारिश में, घुल गई है स्याही, 
रोक न अब 
इसे,..... बाहर आने दे, 
लफ़्जों का हर्फ़ बन,...... हर लाइन पर छाने दे, 
माना जीने के लिए,......
आँखों में सपने जरुरी है,
पर खुली निग़ाह रखने की, देनी पड़ी इन्हें मंजूरी है !! 
आख़िर में क्या कहूँ.........,  
ज़िंदगी की जद्दोज़हद से,......भरने लगा मेरा पन्ना है, 
सुना पड़ा है जो, वो कागज़ नहीं,.....इंसा के दिल का कोना है, 
कुछ यहाँ खोना है, और कुछ हि पाना है !! 
बाकि तो यहीं रह जाना है........., 


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