Thursday, September 17, 2020

Mere Hisse Ki Dhoop..

"आईने को इतनी समझ तो आए 

 मेरे साये को ख़ुद पहचान जाए "


सिमटी यादों का एक पुलिंदा है ज़िंदगी,
सिलसिला न छोड़ इसे समेटने का,
इसके लिखें हर हर्फ़ से झलकती है संजीदिगी !!

गुज़रते वक़्त ने नवाज़ा मुझे असीम तज़ुरबों से, 
पर ज़िंदगी से अदायेगी में,
इल्म हुआ ख़ुद से तार्रुफ़ नहीं बरसों से !!

वक़्त के हाथ से छूटी फ़िर इक तस्वीर पुरानी, 
मकां तो साफ दिखा आँखों का, 
मगर चेहरे पर छाई थी पहली सी वीरानी !!

ये बात तब की है जब कुछ न था पनाह में, 
मेरे हिस्से की धूप भी, 
बिछा रखें थे तेरी राह में !!

चिलचिलाती धूप में पलकें जली इंतज़ार में,
दोष रोशनी का नहीं वो आँखें है, 
जो चुपचाप बैठ सारी रात काटी ख़्वाब में !!

ढ़ली शाम सी नरमी आ गई मेरे जज़्बातों में,
रहने दे नम अनसुलझा इन्हें, 
हर लफ्ज़ उलझे है एक दूसरे को सुलझाने में !!
   
इन बूढ़ी साखों ने झेलें ख़ामोशी से कई पतझड़, 
अब मेरे हिस्सें की धूप, 
इनपर भी थोड़ी आने दे..........!!!   
  

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