Sunday, August 23, 2020

Zindgii...mere jaisi haii...

कभी - कभी यूँ लगा, ज़िंदगी थम सी रहीं,

हर कदम पे ये घट सी रही, कोशिश करी बार बार यहीं,

रुकें नहीं कदम, बिना आए मंज़िल कहीं,

हर नाता, हर बाधा, ज़िंदगी की हर गाथा,

पलटते - पलटते ये महसूस हुआ,

जीवन है एक साधना, ये ज्ञान प्राप्त हुआ,

पता है मुझे अब, अपने हर ज़ख्म की गहराई का,

पैर जमीं पर हो तो चलता है पता, आसमां की ऊचाई का, 

तेज़ लहरों में ख़ुदको पहले भी थाम चूँकि, 

कश्ती से किनारें का पता जान चूँकि, उठे तूफां से क्या डरू, 

अब तो समंदर को नापना, सीख चूँकि हूँ मैं,

फिर भी लगती राहें बोझिल है, दूर अब भी इनसे साहिल है,

राह में कुछ कंकड़ भी चुभे, कई ठोकरें भी मिले,

रंग बदलती इस दुनियाँ में, बहार के मौसम कम हि मिले,

मुश्किल हालात में, पहलू में भीगे लम्हात थे,

संग दबे कुछ अल्फ़ाज़ लिए जा पहुँची,

दुनियाँ के बागीचे में, चादर सी बिछी दरीचे में,

देखने में लगी आँखों को भली, थी सात रंगों से सजी,

पूस की रात में जैसे, पशमीना ओढ़े थी खड़ी,

पल - पल में सुकून तलाशते फिरती है, 

जमीं की तरह ये भी कई परतों में खुलती है,

ये ज़िंदगी भी कुछ मेरे जैसी है..............

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