शब्दों की भी एक उम्र होती है....,
इनके जनम से पहले,
धरती ने भी मौन में ही, पहली बारिश सुनी होगी,
जब माताओं ने बिना कुछ कहे,
पहली बार अपने बच्चों को समझा होगा,
तभी शायद जन्मी होगी "मौन की मातृभाषा,
जिसे कोई स्कूल नहीं पढ़ाता - सिखाता,
पर जनम से हर कोई है इसे जानता,
पिता की चुप्पी में, घर की अधूरी छत,
बेटी की विदाई और बूढ़े माँ बाप का दवाई ख़र्च,
महीनें के आख़िरी दिनों का हिसाब धीरे - धीरे साँस में,
"सब ठीक होगा " मौन में बोलता एक किरदार,
माँ की चुप्पी, रसोई के धुएँ में नहीं,
आखिरी रोटी के रूप में पकती है,जो खुद से पहले,
सबकी थाली में सजती है, उसकी थकान कभी,
शब्द नहीं मांगते, बस बच्चों पर हाथ फेर कर,
पूरी थकान, उनकी मुस्कराहट पर सह लेती है,
कुछ रिश्ते कभी टूटते नहीं,
बस वो बोलना छोड़ देते है, फिर घर में सुनी दीवारें,
घड़ी की टिक - टिक, बरतनों की आवाजें और बंद
दरवाजे के पीछे खड़ा मौन लंबी बातें करते है,
बच्चे अचानक जब शांत हो जाये,
तो समझो शरारत नहीं, उनका भरोसा कही चोट खाया है,
डर हमेशा रुलाता नहीं, कभी - कभी चुप करवा जाता है,
पूर्वजों ने, अपने समय की कठिनाईओं को,
अपनी मुट्ठी में भींचकर जी लिया,
पिता ने, उस चुप्पी को जिम्मेदारी का नाम दे दिया,
और हमने, संस्कार समझ अपनी पीढ़ी को सौंप दिया,
इस तरह, मौन हमारी विरासत बन गया,
अख़बारों में हम रोज पढ़ते है,
संदेश, टिप्पणियाँ और प्रतिक्रियाएँ,
उँगलियाँ अब तेज़ हो गई,
एक दूसरे को धीरे - धीरे पढ़ना जो भूल गई है,
समाज के चौराहें पर, कुछ सवाल सालों से खड़े है,
जो नारे नहीं लगाते, पत्थर नहीं उठाते,
बस इंतज़ार करते है, कोई तो,
उसकी ख़ामोशी को पढ़ ले और विचार करे,
जब मैं अपने भीतर लौटती हूँ,
जहाँ कोई शोर नहीं, आदेश नहीं, तर्क नहीं,
सिर्फ़ सामने मौन बैठा है, जो मुझे पहले से जानता है,
और ये कहता है -
हर आँसू की होती अपनी भाषा है,
हर मुस्कान का अपना व्याकरण,
जो कभी नहीं कहा, धडकनों के बीच अनकहा सा रहा,
आँखों से निकलकर भी, होंठों तक आते - आते ठहर गया,
यही तो है हम सबकी पहली भाषा,
"मौन की मातृभाषा"
