ये शहर मेरा है,
अक्सर मुस्कुरा देती हूँ मैं,
क्यूँकि,जनाब सिर्फ यहाँ पता दर्ज़ होता है,
अपनापन नहीं,
जिस कमरे में रहती हूँ मैं,
उन दीवारों पर लगी,किसी और की कीलें,
बालकनी से दीखता,आसमां भी उधार का,
हर महीने किराया तो चुक जाता,
पर घर होने का एहसास,
हर बार बकाया रह जाता,
यहाँ रिश्ते भी किराये के होते,
जरुरत तक साथ चलते फिर,
अनुबंध के जैसे,चुपचाप अंत होते,
समय यहाँ किसी के पास नहीं,
क्यूँकि, सब भाग रहे,
सुबह हमारी कंपनी की,
दोपहर लंबी कतार लक्ष्यों की,
शाम करे हम ट्रैफिक के हवाले,
और रात हमारी मोबाइल संभाले,
इस शहर में हैं,लाखों खिड़कियाँ,
पर बहुत कम ऐसी जो इंतज़ार में खुलती,
लिफ्टें हमें हर मंज़िल तक छोड़ आती,
पर कदम हमारे पड़ोस तक नहीं पहुँच पाती,
संपर्क सूची तो लंबी हो गयी हमारी,
पर संवाद हो गया है छोटा,
जब माँ कहती अपना ख़्याल रखना,
फ़ोन पर पिता कहते सब ठीक है ना ?
इन दोनों के बीच ठहरा जो मौन है,
वही है सबसे महँगा किराया,
जो कभी कहीं दर्ज़ नहीं होता,
शहर ने छत तो दी,पर आँगन नहीं,
रोज़गार तो दिया,पर इत्मीनान नहीं,
लाखों की भीड़ दी,पर कोई अपना नहीं,
एक दिन मैं भी,ये कमरा छोड़ दूँगी,
कोई और आएगा,
अपना बिस्तर बिछायेगा,
अपने सपनों को,इन्हीं दीवारों के सहारे रखेगा,
ये शहर उसे भी,उतना ही अपना लगेगा,
जितना मुझे कभी लगा था,
किराया सिर्फ़ मकान का नहीं चुकाया,
हर सपना, थोड़ा बचपन,
हर सफलता, कुछ रिश्ते,
हर पहचान, थोड़ी मासूमियत,
हर शहर उसमें बसने वालोँ से,
उसका एक हिस्सा,
हम किराए के शहर में नहीं,
बल्कि किराए की ज़िंदगी में रह रहे,
जहाँ साँसें हमारी,पर समय किसी और का,
रास्ते हमारे,पर मंज़िलें उधार की,
और जब लौटने का समय आता,
इंसान अपने साथ,सिर्फ़ वही ले जा पाता,
जिस पर,
कभी किसी का किराया नहीं लगता —
प्रेम, स्मृतियाँ और मनुष्यता।

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