भीष्म.......,
खुद में ही एक गाथा महाभारत की,
एक किरदार ऐसा जो अपने शब्दों से बंधा,
जिम्मेदारी की जंजीर से जकड़ा,
जिम्मेदारी की जंजीर से जकड़ा,
ऐसा योद्धा, प्रतिज्ञा बनी जिसकी पहचान,
भारतवंशी के वो थे शान,
हस्तिनापुर में थी बसी उनकी जान,
और चाह कर भी जो रख न सके,
अपने पूर्वजों का मान,
इच्छा मृत्यु जो लगती है वरदान,
पर इनके लिए पल - पल थी विषपान,
धर्म जानते थे, सत्य पहचानते थे,
न चाहकर भी,अन्याय के संग पड़े रहे,
राजसिहांसन की मर्यादा में, हाथ बाँधे खड़े रहे,
एक वचन को जीना आसान नहीं,
क्योंकि हर प्रतिज्ञा होती वरदान नहीं,
कुरुक्षेत्र में जितना रक़्त बहा, उतना दर्द अंदर सहा,
गिरते हुए अपनों के साथ, टूटी इनकी भी आस,
हार कर भी पराजित नहीं और जीतकर भी विजेता नहीं,
भीष्म केवल एक योद्धा नहीं,
त्याग और पीड़ा की अमर व्यथा थे,
जो तीर की शैय्या पर लेटा शरीर नहीं,
एक युग का टूटा अभिमान थे,
जीवनभर जिसने सबका भार उठाया,
अंत में सिर्फ अकेलापन उनके हाथ आया,
ये उन फैसलों का हिसाब था,
जो कर्तव्यों के नाम पर लिया खुद के खिलाफ था,
महाभारत ख़त्म हो गई,
पर भीष्म आज भी ज़िंदा है......,
हर उस इंसान में,
जो परिवार जिम्मेदारियों और वचनों के बीच
धीरे - धीरे खुदको खो देता है !!

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