याद है आज भी वो क़िस्सा,.....
जो बन गया ज़िंदगी का अहम् हिस्सा !!
हॉस्टल की चार दीवारी में कैद लगती थी ज़िंदगी,.....
बाहर के शोर से अंदर वीरान सी थी ज़िंदगी !!
जब भी माँ का हाथ गेट पर छूटा,.....
दिल में हमेशा कुछ न कुछ टूटा !!
उन्हें जाते आख़िरी मोड़ तक निहारते रहती,......
फिर कब मिलना होगा मन में सोचती रहती !!
क्यों ख़ुदको मुझसे दूर किया,......
मेरे साथ ही क्यों ये अन्याय किया !!
पढ़ाई क्या इतना जरुरी है,.....
इसके लिए अपनों से जुदाई क्यों जरुरी है !!
उन नादान सवालों का आज मुझे ज़वाब मिला,.....
जब राहों में खुदको अपने बल खड़ा पाया !!
गुरुओं के सीख पर आज होता मुझे गुरुर है,....
सिखाया गुर हर मोड़ काम आता जरूर है !!
बचपन का लिखा वो लेख,.....आज सच लगता हैं !!
"तप कर हि इंसान और निखरता है "

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