सब पूछते है,.... क्या करते हो आजकल,
लिखते हो ,..... क्या लिखते हो आजकल,
क्रांति नहीं,.... शांति लाने की कोशिश है आजकल,
ख़ुदा ने बनाया ज़न्नत का,... मुखड़ा ये जहां,
देखो आज तो लगता है,.... टुकड़ो में बटा ये जहां !!
कोई किसी की सुनता नहीं,...गिला -शिक़वा बेकार है,
यहाँ अपनों की ख़बर भी देता अख़बार है !!
बिकते यहाँ हालात और विचार है,...जो टीवी पर आते सुबह शाम है,
मंदिरों पर टिकी सियासत है,.. गुनाहगार गिरफ्त से बाहर है !!
सत्यम शिवम् सुंदरूम, विद्या ददाति विनयम, जहाँ सीखा हमने,
आज बना वो सियासी व्यापार है,....हम मुक दर्शक जो लाचार है !!
प्याज से सस्ते यहाँ ईमान है,...खुदको कहते हम मनु की संतान है,
रोष तो है सबके अंदर,.....क्या बोलू, क्या रखूँ,सब है इसी झंझट में,
डर है,... उलझ ना जाए किसी अनसुलझे उलझन में !!
हमसे पनपा रावण भी निकल बाहर अट्ठाश लगाता है :-
मैं तो रावण हूँ,.....जन जन में बसा सर्वयापी हूँ,
अक्स को मेरे जो मिटा सके,...वह शख्स कहाँ से लाओगे,
सिर्फ शब्दों की वॉर में,.....राम कहाँ से लाओगे !!!

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