रोज़ - रोज़ पलकों तले,... आते हो तुम दबे पाँव चले !
कुछ खट्टी - कुछ फीकी मुस्कुराहटों में ,....ज़िंदगी के कई सिलवटें लिए !!
बदलती रुत में भी देखा तुम्हें,.....बदलती रात के चादर तले !
छत पर जैसे ओस की शबनम ढले,...तू पिघलता है रोज मेरे सिरहाने तले !!
तेरा इंतज़ार बुझी पलकें ही नहीं,......दिल भी करता है !
ख्वाहिशें लेती है करवटें,.....और दिल चादर बदलता है !!
क्या कहूँ यारों.... सपनों का तो ये आलम है !
बंद हो तो क़ायम है,....खुली पलकें तो गायब है !!
बेगानी इस जहां में लगता कोई तो अपना है,....इन जगी आँखों में आता एक हि सपना है !
ख़ुदा की रेहमत में,.. मैं भी शुमार हो जाऊ,....एक दिन में भी ग़ालिब या गुलज़ार हो जाऊ !!

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