Wednesday, January 15, 2020

Sapne....jo hai apne

                                 
                    


                                    रोज़ - रोज़ पलकों तले,... आते हो तुम दबे पाँव चले !

कुछ खट्टी - कुछ फीकी मुस्कुराहटों में ,....ज़िंदगी के कई सिलवटें लिए !!

बदलती रुत में भी देखा तुम्हें,.....बदलती रात के चादर तले !

छत पर जैसे ओस की शबनम ढले,...तू पिघलता है रोज मेरे सिरहाने तले !!

तेरा इंतज़ार बुझी पलकें ही नहीं,......दिल भी करता है !

ख्वाहिशें लेती है करवटें,.....और दिल चादर बदलता है !!

क्या कहूँ यारों.... सपनों का तो ये आलम है !

बंद हो तो क़ायम है,....खुली पलकें तो गायब है !!

बेगानी इस जहां में लगता कोई तो अपना है,....इन जगी आँखों में आता एक हि सपना है !

ख़ुदा की रेहमत में,.. मैं भी शुमार हो जाऊ,....एक दिन में भी ग़ालिब या गुलज़ार हो जाऊ !!






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