Tuesday, April 14, 2020

Kahan Tum Chale Gaye.....

कोई पढ़ले न ये क़िस्सा, डर लगता हैं ,

जहाँ रहता है तू ........लगा वहाँ तारोँ का पहरा हैं !

हज़ार कोशिशें की तारोँ ने तुझे छुपाने की,

उजाले चाँद ने फैलाए फ़िर भी घर आसमां का अँधेरा हैं !!

तसव्वुर में भी न थी कभी दूर जाने की 

पत्तियों की सरसराहट देती थी आहट तेरे आने की !

आज भी ठहरी है आँखें छोड़े हर निशां पे तेरे

ख़्वाहिश है तेरे रूह को दोबारा पाने की !!

रास आया नहीं मुझको कभी बारिश का मौसम 

ताउम्र रहा राहों में पतझड़ का आलम !

सज़ा पाई है लबों ने फ़िर मुस्कुराने की अब

आदत हो चली शाम संग रोज़ ढल जाने की !!

शाम ये रोज़ खता करती है तेरे होने का पता देती हैं, 

सज़दे को तेरे उठते है फ़िर सहम जाते है क़दम !

हर मंज़र जब तेरे जाने का सबब पूछते हैं, अपने भी

अब जान गए सिर्फ तड़पता जिस्म तुम छोड़ गए,

कहाँ तुम चले गए.............., 

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