लोग अकसर कहते मुझे....... मैं सोचती बहुत हूँ 👧👧👧
टूटी कस्ती से.... किनारों के सपनें..... देखती बहुत हूँ !!
ख़ुद की गलतफैहमी को......पहचानते नहीं 👉👉👉
और कहते है लोग... हम कहने का मतलब... समझते नहीं !!
रोज यहाँ जीने की..... ज़िंदगी....एक वजह ढूँढ़ती हैं ✊✊✊
औरों से कम...... ख़ुद से ज्यादा.... लड़ती हैं !!
हर मोड़ पर...... अपनों से पहचान क्या हुई......ज़िंदगी 😐😐😐
तन्हाँ तो पहले भी थी...... अब वीरान सी हो गई !!
तज़ुर्बे से..... ज़िंदगी को साँचे में ..... ढ़ालती रहीं 👩👩👩
ख़ामोशी से..... अपने बुत का मातमं.... मनाती रहीं !!
दर्पण जो देखूँ आज ..... दीखता एक कैद परिंदा हैं 🙍🙍🙍
पर् कटे है जमीं पर.... आरज़ू आसमां की ज़िंदा हैं !!
ताउम्र बिना रीती -रिवाज़ों की..... ज़िंदगी चाहती हूँ 💖💖💖
बंदिश की श्याही न हो........ वो कलम चाहती हूँ 💝💝
ऐ ज़िंदगी.... तुझसे..... खुद से खुद की दुरी 💞
तय करने का....... हौसला चाहती हूँ 💕💞💕

suprb
ReplyDelete