Thursday, March 05, 2020

Zindgii....


लोग अकसर कहते मुझे....... मैं सोचती बहुत हूँ 👧👧👧

टूटी कस्ती से.... किनारों के सपनें..... देखती बहुत हूँ !!

ख़ुद की गलतफैहमी को......पहचानते नहीं 👉👉👉

और कहते है लोग... हम कहने का मतलब... समझते नहीं !!

रोज यहाँ जीने की..... ज़िंदगी....एक वजह ढूँढ़ती हैं ✊✊✊

औरों से कम...... ख़ुद से ज्यादा.... लड़ती हैं  !!

हर मोड़ पर...... अपनों से पहचान क्या हुई......ज़िंदगी 😐😐😐 

तन्हाँ तो पहले भी थी...... अब वीरान सी हो गई !!

तज़ुर्बे से..... ज़िंदगी को साँचे में ..... ढ़ालती रहीं 👩👩👩

ख़ामोशी से..... अपने बुत का मातमं.... मनाती रहीं !!

दर्पण जो देखूँ आज ..... दीखता एक कैद परिंदा हैं 🙍🙍🙍

पर् कटे है जमीं पर.... आरज़ू आसमां की ज़िंदा हैं !!

ताउम्र बिना रीती -रिवाज़ों की..... ज़िंदगी चाहती हूँ 💖💖💖

बंदिश की श्याही न हो........ वो कलम चाहती हूँ 💝💝

ऐ ज़िंदगी.... तुझसे..... खुद से खुद की दुरी 💞

तय करने का....... हौसला चाहती हूँ  💕💞💕






1 comment:

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