Wednesday, March 11, 2020

Narazgii...


ज़ख़्म की तासीर गहरी हो,तो नाराज़गी भी लाज़मी हो..,

नफ़रत भी हो, गर मुमक़िन हो, तो कागज़ी हो ......,

नाराज़ मंज़र भी, जब झुण्ड में सर उठाये हो......., 

कश्मकश दिल में, और दिमाग में जंग जारी हो..........,

फ़िर शब्दों को ज़रिया बना, कोशिश कर तेरे.............,

अल्फ़ाज़ कि कलम, तेरे हालात पे भाड़ी हो .............,

जिसने अक़सर बेक़सी और तक़दीर की बेरूख़ी देखि हो.............., 

कैसे दूर उससे नाराज़गी हो......, 

जब अपने क़रीबी ही बन बैठे, उसके रक़ीब हो..............., 

आईना निहार कर सवारा भी........., 

कई दफ़े आँखों से किया इशारा भी........., 

खिलौना बना उम्मीद संग खेला भी, पर न गई नाराज़गी ...............,   


तब बात एक समझ आई......, 

संग जब रंज के किस्मत हो, तो तर्क़ नहीं, कोशिशें बेहिसाब हो.............., 

दर- ब -दर ठिकाना ढूंढ़ती, एक ख़्वाहिशों कि कस्ती हो.............,  

दूर कितना भी हो साहिल, फ़र्क नहीं, मचा बस वहाँ कोहराम न हो.............,


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