Tuesday, August 18, 2020

Tu Issh Tarah Se......

तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है.............  
जहाँ तलक जाए ये नज़रे........  
लगे नज़ारों में तेरी कमी सी है,

तेरे बैगैर राहें भटक गई थी कहीं
ढूँढा हर शह, हर गली, हर मीनारों में, 
  
तुझ में खोकर हि हुई पूरी तलाश मेरी 
अब सिर्फ तू ही अपना जो रोशन गैरों की महफ़िल में है,

तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है...........  
ये आसमां ये सितारें कर रहें जहां रौशन 
फ़िर भी बैठा हूँ मैं शाम -ए- ग़म के अँधेरों में,

तलाश में तेरी कई मुद्दत से हूँ मैं 
ख़फ़ा हूँ पर तुझ में हूँ बाकि जगह लापता हूँ मैं, 

मैं हूँ एक जलता दिया तू जिसकी रोशनी है   
क्या कहूँ तुझ बिन ज़िंदगी लगती अधूरी है

पनाह में तेरी हर हसरतें भी मेरी क़ामिल है  
तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है.......... 




Friday, August 07, 2020

Khushboo...

हर तरफ मशहूर हुआ इतना
अब ग़ुमनाम होने की हसरत है
देखूँ जब भी आसमां
होने लगती दूरी से नफ़रत है
जलते दीये की रोशनी भी
तब चाँद सी लगती है
जब अजनबी शहर में 
अँधेरी रात.........  
थोड़ी ठहर कर गुज़रती है
चलो कुछ माहौल  
साझा करते है
खूबसूरत लोग और कुछ
खूबसूरती की बात करते है
करीने से लगा रखें है......  
टेबल पर मौसमी फूलों के 
जैसे बाज़ार सजा रखें है
आस - पास भिनना रहे 
कई चाहने वाले
छिनकर रंगत इसकी 
खुद को कहे इनके रखवाले
हो गया है इश्क़ इन्हें 
फूलों की संगत से
सोचे रंग - संग ख़ुश्बू भी 
कर दे इनके हवाले........ 
बचे कुछ कोरे पन्ने है 
सूखी जिसमें कुछ पंखुरियाँ है 
देख इन्हें लगता है 
हर साथ होता यहाँ अधूरा है.......   
कुछ बीती बातें है इस ज़िंदगी की 
अब भी अनकही.........  
मुड़कर यूँ देखती है मुझको 
जैसे जानती तक नहीं.......   

Monday, July 27, 2020

Ijaazat Toh Do....

कितनी रूमानी रातें यूँ ही छत पर गुज़री
कभी चहल कदमी में....कभी नंगी फ़र्श पर लेटे
आसमां को निहारते कहा कई दफ़ा 
मौसम -ए- हालात कैसा भी हो गुरेज़ नहीं 
कर सकूँ अपनी बेचैनियों की हिफाज़त इतनी मोहलत तो दो !!

सुबह की पहली किरण से पलकें है भाड़ी  
इनपर भी हो कभी ओस की बारिश
सोयी नहीं कब से नगमें हमारी  
छेड़ दे ज़रा वो धुन.....जो लगे तुझे प्यारी
इन गीतों की तरह आधे - अधूरे ख़्वाब है 
इन्हें फिर आँखों में सजोने की इजाज़त तो दो !!

धीमी - धीमी पिछली रात संग मेरे जो नज़म जली 
सुबह से मिलने भोर तक थी मेरे पास रुकी
फर्श पर अभी कतरन सी बिछी और थोड़ी सी राख़ बची
कर दूँ इसे मिट्टी के हवाले पहले जख़्मों पर मलने तो दो !!

आया है सावन..... मौसम लिए बारिश 
जमीं से मिलने की हो रही फिर से साज़िश 
दिल करता है मैं भी कर दूँ लम्हों को 
लफ़्ज़ों में बीत जाने की गुज़ारिश 
गीली पड़ी है दिल की जमीं इनमें ख़्वाब के बीज बोने तो दो !!



Saturday, July 18, 2020

Phir Yeh Raat Akelii...

कैसे कहूँ कैसे कटी रातें 
                       .........दिन निकला सुबह हुई 
    ........फिर हुई यादों की बरसातें 
सूखे से है दिन..... 
                     .......सूखी लगे शामे
सूखी - सूखी सी है..... ख़्वाब में भीगी रातें 
     बेचैन हुई रात फ़िर..... 
          .........सूरज से लगाई गुहार कई   
दूर कैसे रहें अँधेरों से है इसे प्यार भी
दिनों बाद आई......फिर ये रात अकेली.....
    .........छुपकर किरणों से फ़िर बनने मेरी सहेली
💫        💫           💫             💫
कुछ अपनी कहूँ..... 
          .........कुछ इसकी सुनूँ 
इक पल को भी संग इसके......चुप न रहूँ 
जो नीभ न पाई...... 
         ........उन वादों की देने दुहाई
लो इसी बहाने रात...... 
            ........फिर मुझसे मिलने आई  
💕        💕           💕              💕
सोचा कई बार.......छोड़ दूँ इसका भी साथ 
फिर याद आई.......  
          .........बीती रात जो थी वीरानी
गुज़रे पल थे ऐसे...... खड़ी सुनी हवेली जैसे
हर मोड़ मिली...... 
          .......पर जो न सुलझी वो तू पहेली  
बीतें दिनों की ठहरी 
            ........ तू ही मात्र सहेली 
दिनों बाद आई......फिर ये रात अकेली.....
💗          💗           💗            💗
गुज़री हर लम्हें मैं.......... 
          .........पर रहा रुका साया इंतज़ार में
कहने को इक बूँद न गिरी......  
  .........फिर भी भीगी हूँ इश्क़ की बरसात में  
न जाने दिल की कही.......  
                .......सच कब कैसे होगी
मद्धम चाँद और तारों को कब......
              ........नसीब अपनी रौशनी होगी
अंजाना सा डर है मुझे.......
   ........फिर भी चाहूँ दिल से दुआ दे तू मुझे
याद शहर से संग आई.......
               ........ तू ही बची एक करीबी है 
दिनों बाद आई......फिर ये रात अकेली......

    

Tuesday, July 14, 2020

Sookhe Patte....

सूखे पत्ते....कहते है अनूठा अंग हूँ मैं
पेड़ का जो रहे कभी 
पेड़ से जुड़ा कभी जमीं पे पड़ा 
आज़ाद होने की चाहत में अकसर 
आशियाँ छोड़ अपना हवाओं 
संग लावारिश बन उड़ता फिरा !!

टहनियों से संग क्या छूटा
धूप छाँव से भी रिश्ता टूटा   
हर मौसम ने यूँ मुख मोड़ा
हर साख़ ने कुछ इस तरह दिल तोड़ा 
पड़ा महँगा घर छोड़ना
अपनी शर्तों पे लहरों से नाता जोड़ना !!

यू हि बेख़बर उड़ चला था मैं  
इश्क़ की बारिश में 
अल्हड़ सा हो गया था मैं 
अंजाम -ए- सफ़र क्या हो मालूम नहीं 
मंज़िल से भी रूठ कहीं बैठा था मैं !!

देखा न था सूखे पत्ते को 
इश्क़ करते कभी टूट के यूँ बिखरे
जैसे जमीं की सजावट हो कोई  
सूखे अल्फ़ाज़ है ये ज़र्द पड़े जज़्बात है ये 
देखा है अकसर समेट इन्हें  
आग के हवाले करता है अपना ही कोई !!     

Thursday, July 09, 2020

Lo Phir Aayii.....

लो फिर आयी......तेरी यादें लगी बढ़ने बेचैनियाँ रातों की,
सुना है मैंने कई किस्से, तेरे मेरे जज़्बातोँ के,
तुम आओ तो तुम्हें कह दूँ, होता नहीं अच्छा
आदत हो गर देर से आने की !!

सच है ये.......सही चाहत हो गर, फ़र्क पड़ता नहीं,
तय किए कितने मिलों का सफ़र,
सुनी पड़ी राहें खोल के बाहें, करें गुज़ारिश बीते
लम्हों को फ़िर से गुजरने की !!

सुन लेती है.........ये अकसर वो सदायें भी
मुमकिन नहीं जिनका, तसव्वुर में आना भी,
लो हुई शाम भी भाड़ी, करवटों में गुज़री रात सारी 
सोचूँ जब भी दिल को बहलाने की !!

होता नहीं आसां.......बिखरे अल्फ़ाज़ों को समेटना,
लगे यूँ जैसे पुराने ज़ख्मों को कुरेदना,
रहता है साझे रिश्तों का मर्तबान खाली, है जरुरत 
नई यादें फ़िर इक बार सजोने की !! 


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