Sunday, May 17, 2020

Bargad Ka Ped....

सालों बाद नींद से जागा शहरी दरवाज़ा खुला 
फ़िर गांव की ओर भागा............   
मुड़ कर देखा वहीं बरगद का पेड़
जो जमीं को जकड़े गांव की सीमा
पर आज भी चौकीदार बना खड़ा था !!
सूरज की गर्मी जला रही थी काया 
निकट थी इसके तरुवर की छाया !!

दो पल को ठहरा लगा वह मुस्कुरा रहा
और मेरा दर्द जो कहीं खो रहा !!
गुज़रे वक़्त की मिट्टी बैठ पैरों से कुरेद रहा
उसकी जमी जड़ों में अपनी ज़मीर तलाश रहा !!

ज़िंदगी जब वक़्त की मोहताज़ न थी 
सूरज में भी इतनी आग न थी !!
अम्बर धरा में लगती न थी दूरी 
होती कहाँ थी बचपन में मज़बूरी !!

लहरों से लड़ती नाव ढूँढ़े जैसे किनारा
भटके मन को मिला तेरे पास सहारा !!
सूखी झूलती ये बेलियाँ जो सदियों बाद
मुझसे मिल रही और कह रही............
    
गर्मी तो मौसम में है तू रिश्तों में लिए बैठा है 
काबिल बनने कि होड़ में तू क़ामिल बन ऐठा है 
मैं आज भी यहीं हूँ जो तेरा बचपन सजोए बैठा है !!


Thursday, May 14, 2020

Tere bina.....

तेरे बिना...... ख़ुदको कभी सोचा ही कहा था,
तूने ऐसा कुछ वादा दिया भी नहीं था,
बेख़याली ने ली है करवट या नज़रों का है धोखा,
बंज़र जमीं में दिनों बाद आया बारिश का मौका,
सूखे ताल लिए जी रहे कुछ कंकड़ और कुछ काई,
जैसे भीड़ भरे मेले में संग चले तन्हाई !!

तेरे बिना....... ज़िंदगी का जाने क्या इरादा है,
ख़ामोश दिल में भी जवाब चंद सवाल ज्यादा है,
कुछ तो टूटा है अंदर शाम भी आज सुलगा है,
तारों ने आज चुपके से आसमां को कुछ भरमाया है,
यू नहीं बादल की ओट में चाँद फ़िर शरमाया है,
भूलना चाहा याद है फ़िर भी क्या खोया क्या पाया है !!

तेरे बिना...... याद तन्हाई बन दिल में पला करती है,
बिन पूछे बुझे इश्क़ को हवा किया करती है,
लफ़्ज़ों में जो बिखरा है वो ग़ज़ल में लिपटा एक मुखड़ा है,
दौर जब मज़बूरियों का हो तो हर दर्द लगता अपना है,
ख़ामोशियों की जुबां में दिल फ़िर देखता वहीं सपना है !!





Friday, May 08, 2020

Jaane doon....

ज़िंदगी क़दमों की दूरियों में सिमटी !
क्या कहे..........,
मिले साये कम, सारी धूप में गुज़री !!
बची जो रौशनी है रखूँ या जाने दूँ..........

चंद ख़्वाब थे जो थे दबे - अनछुये !
क्या कहे..........,
बेफ़िक्र हम घरों में सोये, ख़्वाब गलियों में फिरे !!
देखा जो ख़्वाब था रखूँ या जाने दूँ...........

बोलती रातों में जब चाँद को देखा था !
क्या कहे.........,
उसकी बेवफ़ाई से, इक तारा भी टूटा था !!
माँगी वो दुआ रखूँ या जाने दूँ...........

ख़्वाहिशें हो गई जब जरूरतों से बड़ी !
क्या कहे..........,
महंगी तेरी रूह हो चली, चाहतें जिसमें खो सी गई !!
रूह से तेरे नाता रखूँ या जाने दूँ...........

वो जो भी था तेरे मेरे दरमियाँ !
क्या कहे.........,
जानेमन आँखें तो मिची, पलकें पर खुली रह गई !!
बेचैनी जो हिस्से आई है रखूँ या जाने दूँ..........

पहचानी सी ख़ुश्बू से महका है आज ये जहां !
क्या कहे..........,
बरसी है यादें बूँदें बन, जमी थी बरसों पलकों तले !!
नम जो आँखों है ये रखूँ या जाने दूँ............

Wednesday, May 06, 2020

Kuch Issh Tarah.....

हक़ीक़त सारे ख़्वाब हो जाते !
किस्मत ने खड़े, अगर फ़साद न होते !!

आता नहीं कुछ भी नज़र !
लगे हो राह में, जब मुश्किलों के शज़र !!

वक़्त ने खड़े किये कई सवाल !
फ़ितरत थी ख़ामोश, फ़िर भी देने पड़े जवाब !!

साँसों से बंधा बोझिल जीवन !
जीना पड़ा, हर तरफ बहती हवा को था यही अभिमान !!

हर सफ़र में मंज़िल का यकीं !
कश्ती तो जीत की लगी, साहिल हार पर मिली !!

चाहा समुद्र को दाएरे में बांधना !
मुश्किल था लहरों के बदले, मिज़ाज को साधना !!

अक्स दिखता नहीं अब भी कहीं !
दूरी दरमियाँ थी हमारे, या लगा आईना हि बेसब्र है अभी !!

तसव्वूर में भी न आया कभी !
आज वो हाज़िर है, माथे की लकीरों में तनाव भी लाज़िम हैं !!









Friday, May 01, 2020

Jeevan - Mrityu......

कारवां सफ़र का,.... कहीं रुका नहीं,

सिलसिला जिंदिगी से,....अभी टूटा नहीं,

रोज़ लेती है जन्म तू..........,

पर दोबारा मिलन का, लेती तू कोई वादा नहीं !!

कहते है ज़िंदगी तू एक कविता है.........,

तो मौत क्या है ?

बोझिल पलकें,......  मंद पड़ती नब्ज़, 

तेज़ धड़कनों के बीच,.....  छूटती साँसें,

सामने बिखरें लम्हें,........ हिलती दीवारों पर लगी तस्वीरें, 

कुछ ख़ौफज़दा चहेरे,..... जिन पर दिखें काल से पहरे,

अनंतकाल से चल रहा,..... जन - जन का यहीं आख़िरी दृश्य हैं,

जिस घर भी,....  सूरज होता अस्त हैं !!

सर्द होंठों में,.....  बची अब नमी नहीं,

ज़िंदगी भर ज़िंदगी से,.... कभी बनी नहीं !!

माना दिख रहा हूँ हीन मैं..........,

.........  ख़ुद के लिए नहीं अपनों के लिए हूँ ग़मगीन मैं,

पर तुझसे हारा नहीं,........ ए मौत तुझसे डरा नहीं हूँ मैं !!

जीवन गर इम्तिहान है,.....  तू उसका परिणाम है,

तुझसे कैसी लड़ाई,.... जो हरेक हिस्सें आई हैं,

तू ईश्वर की आख़िरी कारवाई हैं, यहीं जीवन की सच्चाई हैं !!

जमीं के सितारें तोड़ कर,..... तू आसमां को रौशन करता हैं,

आँसू हमारे सूख चुके,...... तू बादल बन बरसता हैं, 

और हमें कलयुग बासी कहता हैं !!


  

Sunday, April 26, 2020

Ek shehar.....

एक शहर, एक मोहल्ला
साथ - साथ जहाँ, पले - बढ़े थे हम !
रिवाज़ों से नहीं, दिल की जमीं से जुड़े थे हम !!

छनकर आती धूप, चुपके से शुभ - प्रभात बोले !

सुबह की अज़ान जब, नींद के परदे खोले !!

सबके मुख में मिश्री धोलें, माथें तिलक शोभे !

साँझ की आरती लिए, हर दर जब दिये जले !!

कौन हिन्दू, कौन मुसलमां
ये सोचने का वक़्त था कहाँ...........

सेवइयाँ और गुजियां की ख़ुश्बू में,
सजता हर शाम बाज़ार था !

कुछ रक़ीब पुराने, कुछ नये दीवाने
इसी बहाने जिनका गश्त गली में बार - बार था !!

यादों का कारवाँ लिए, फ़िर शहर -ए- सफ़र जारी हैं........
सुनी गलियाँ, फीके आज हर नज़ारे हैं !
आहट से खुलती है खिड़की, बंद पड़े दरवाजे हैं !!

ज़हरीली ऐसी हवा चली, घुट गई गली - गली !
रंगों की लड़ाई में, लुटी हर बाग़ की कली !!

यकीं होता नहीं, बचा कोई सगा नहीं, 
अपना वो शहर अब रहा नहीं !!

आसमां पर नहीं, जमीं पर यहीं था बसा.......... 
एक शहर........




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