Sunday, March 08, 2020

Jhuki palkein....


नहीं होना चाहती उदास,....  खोना नहीं मुझे मंज़िल की प्यास,

हर मंज़र पे फ़तेह चाहती हूँ..... ज़िंदगी से हर पल.... जीने की वज़ह चाहती हूँ ,

पढ़ती हूँ जब कभी..... औरत पर हो रहे..... कैसे - कैसे प्रहार,

तो अपनी आँखें मुंद लेना चाहती हूँ  !!

कहते है हर इंसा में...... राम बसता है पर नज़र तो..... रावण ही आता हैं,

इतने मसरूफ़ होते है हवस में..... कि दर्द को समझने की.... फ़ुरसत नहीं होती,

इंसान के लिबाज़ में...... जब दिखें शैतान,

तो अपनी आँखें मुंद लेना चाहती हूँ  !!

हर कैदी पिंजरा खुल जाए...... बंदिश की बंधी ज़ंजीर टूट जाए, 

जख़्म की जलन भी..... मद्धम हो जाये,.... काश ऐसा हो,

रब की तरह आँखें मुंदु,..... और सब कुछ बदल जाए,

तो अपनी आँखें मुंद लेना चाहती हूँ  !!

नापाक़ न कर उसके.... दामन को, कुरूप न कर..... उसकी काया को,

माना तेरा कोई वास्ता नहीं..... ज़ज्बात से उसके..... कोई रिश्ता नहीं,

अपनी मद में...... तू ये न भूल नारी के है..... अनेक रूप, 

जब भी रूप काली का धरा.... चण्ड -मुण्ड का सर.....धरती पर गिरा  !! 

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