Thursday, May 14, 2020

Tere bina.....

तेरे बिना...... ख़ुदको कभी सोचा ही कहा था,
तूने ऐसा कुछ वादा दिया भी नहीं था,
बेख़याली ने ली है करवट या नज़रों का है धोखा,
बंज़र जमीं में दिनों बाद आया बारिश का मौका,
सूखे ताल लिए जी रहे कुछ कंकड़ और कुछ काई,
जैसे भीड़ भरे मेले में संग चले तन्हाई !!

तेरे बिना....... ज़िंदगी का जाने क्या इरादा है,
ख़ामोश दिल में भी जवाब चंद सवाल ज्यादा है,
कुछ तो टूटा है अंदर शाम भी आज सुलगा है,
तारों ने आज चुपके से आसमां को कुछ भरमाया है,
यू नहीं बादल की ओट में चाँद फ़िर शरमाया है,
भूलना चाहा याद है फ़िर भी क्या खोया क्या पाया है !!

तेरे बिना...... याद तन्हाई बन दिल में पला करती है,
बिन पूछे बुझे इश्क़ को हवा किया करती है,
लफ़्ज़ों में जो बिखरा है वो ग़ज़ल में लिपटा एक मुखड़ा है,
दौर जब मज़बूरियों का हो तो हर दर्द लगता अपना है,
ख़ामोशियों की जुबां में दिल फ़िर देखता वहीं सपना है !!





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