Tuesday, March 17, 2020

Mein Ek Dehatiii...

भरी दुपहरी में...... अपनी परछाई से दूर भाग ,
राख से है कपड़े सने,.... हथेली में रेत लिए शहर की 
सीमा पर खड़ा खो गया...... बन शहरी मुसाफ़िर ,
मैं एक देहाती........,

शहर की कस्तूरी खुश्बू में..... झूमता रहा,
बड़ी - बड़ी ईमारतों में...... कश लगा घूमता रहा,
कितने लाशें तह गई..... आज इक और इमारत ढह गई,
अरमां दबे कितने,....किसको पता,.....दामन छूटे कितने,
किसको पता,.....कितने में हुए ये सौदें,.....किसको पता,
मैं एक देहाती........,

प्यार, दुआ चला था संग,....... पगड़ी सर पे बाँध, 
पेड़ की आड़ लिए.....दो प्यासे नैन खड़े.....जो थे बेज़ान पड़े ,
शहर की सकरी गलिओं में......जाने कहाँ सब खो गए,  
पगड़ी भी जाने कब......कदमों के भेंट हो गए....बचा सिर्फ़,
मैं एक देहाती........., 

जहाँ फ़ैली है माया की अँधेरी,....वो मुझे क्या,....देगी रौशनी,
मैंने खुद चुनी,....अपनी उलझन,....छोड़ा जब गाँव का आँगन ,
पेड़ों में जब आम लगते थे.....रात के जुगनू आँखों में....चमकते थे,
अब ये सिलसिला भी टूटा,....उगाये आम हमारे,....शहरी हो गए और
मैं एक देहाती.........., 

  

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